साबित तो करना ही होगा, वरना…

निश्चित रूप से सब गलत नहीं हैं, लेकिन गलत यह है कि ‘वो बाकी सही लोग’ अपने आप को देश हित के साथ होना साबित करने के लिए , बुरे लोगों के खिलाफ मुखर नहीं हैं। हर आम हिन्दुस्तानी का इससे आक्रोशित होना स्वाभाविक ही नहीं वाजिब भी है। फिर ऐसी स्थिति से सवाल और संदेह पैदा होना भी लाजिमी है। यह बात तो है ही ना कि जरा-जरा सी बात पर फतवे जारी करने वाले आज उस तबलीगी मौलाना को इस्लाम से खारिज क्यों नहीं कर दे रहे हैं, जो देश में कोरोना के फिलहाल तक 30 फीसदी से ज्यादा मामलों के लिए जिम्मेदार है, आंकड़ा बढ़ता जा रहा है। रोहिंग्याओं को भारत में बसाने के लिए शहर-शहर जबरदस्त जलसे हुए, सड़कें जाम हुईं। मुम्बई के शिवाजी मैदान में हुआ बवाल तो इतिहास में दर्ज हो गया। रोहिंग्याओं के लिए शिवाजी की प्रतिमा को तोड़ने के अलावा जानवरों की तरह घमासान किया था। सीएए/एनसीआर का डर दिखा कर भी देश में जो हिंसा हुई, उससे खरबों की सम्पत्ति नष्ट हो गई। इन दोनों ही मामलों के समर्थन में सोशल मीडिया पर जमकर बेहद आपत्तिजनक/गलत/भ्रामक संदेश वीडियो/फोटो/टेक्स्ट के रूप में वायरल‌ हुए। परिणाम क्या निकला-ढाक के तीन पात। अब न कोई रोहिंग्याओं को रो रहा है न सीएए/एनसीआर की बात कर रहा है, देश का भारी नुक़सान करने के बाद। कहीं से भी नहीं लगा, इन्हें भारत का हित प्यारा है।
देश को अब कोरोना आतंकी दहला रहे हैं। इनका जगह-जगह पर थूकना, हाथों में थूंक लेकर रेलिंग, फर्श, बसों आदि पर लेपना, चिकित्साकर्मियों/पुलिसकर्मियों आदि पर थूंकना इन्हे फिदायीन साबित करने के लिए पर्याप्त है। और तो और कपड़े उतार कर घूमना। कहीं से लग रहा है क्या, ये भारत के हितैषी हैं?इनके दिल में भारत के प्रति प्यार है? आतंकवाद का यह नया तरीका परम्परागत तरीके की तुलना में बेहद ख़तरनाक है। आज कहां हैं वो अच्छे लोग? इनके विरोध में रैलियां नहीं निकाल सकते, मजमे नहीं लगा सकते, तो सोशल मीडिया पर तो निंदा करते हुए नजर आ जाओ। दिल्ली हिंसा में क्या हुआ था? सबूत बता रहे हैं, जबरदस्त प्लानिंग से हुआ था सब कुछ।
यह बात तो हमेशा से सुनते आ रहे हैं कि किसी एक तबके के सभी लोगों को घेरे में नहीं लेना चाहिए, तो भाई इसके लिए तो तबके को ही चाहिए कि ऐसी छवि (जो अनगिनत घटनाक्रमों और हालातों से बनी है) को दूर करने के लिए बुरे लोगों की खुलकर खिलाफत करे‌। वरना सच्चाई तो यह है, जो बेहद कड़वी है, वो यह कि, अगर वास्तव में अच्छे लोग, बुरे लोगों के खिलाफ मुखर नहीं हुए तो यह जहर और अधिक जहरीला होता जाएगा। फिर कह रहा हूं, वो शख्स भी बुरा ही है, जो बुराई का विरोध नहीं करता। बुराई पर चुप रहना, उसे मौन स्वीकृति ही मानी जाएगी, और यह मानी भी जा रही है। आज टीवी पर जो भी मौलाना तबलीगी कोरोना गैंग की निंदा कर रहे हैं तो उनकी जुबान बेहद नपी तुली, धीमी रहती है। घुमा-फिरा कर बात कर रहे हैं। ये ही मौलाना रोहिंग्याओं/सीएए-एनआरसी के मुद्दों पर सरकार के खिलाफ जोरदार चीखते नजर आते थे। अदालत में आरोपी को ही सबूतों से यह साबित करना पड़ता है कि वो आरोपी नहीं है। जबकि यहां तो एक के बाद एक ऐसे घटनाक्रम होते जा रहे हैं, सबूत आते जा रहे हैं, जो आरोपी के खिलाफ जा रहे हैं। इसलिए सही साबित तो करना ही होगा।
-राजीव सक्सेना
Editor in Chief
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