बूंदी: लॉक डाउन में लोडिंग वाहन चालक से बनना पड़ा किसान, नवाचार ने बदल दी तकदीर
बूंदी जिले के नैनवां तहसील के गम्भीरा गांव के युवा किसान लोडिंग वाहन चलाते थे, लॉक डाउन में इसके बंद हो जाने से मजबूरी में खेती करने लगे, रिलायंस फाउंडेशन के मार्गदर्शन में किए नवाचार के बाद अब उन्हें कहीं और काम करने की जरूरत नहीं
एनसीआई@बूंदी/नैनवां
जिले की नैनवां तहसील के गम्भीरा गांव के युवा किसान नेतराम सैनी ने पहले कोरोना महामारी से लगे लॉक डाउन के चलते महीनों तक बेरोजगारी की मार झेली, बुरी तरह परेशान रहे। कोई रास्ता नजर नहीं आ रहा था। मगर तभी संयोग से वह एनजीओ रिलायंस फाउंडेशन के सम्पर्क में आए। वहां सहायता मिलने पर टमाटर की खेती करने की इच्छा जाहिर की। इस पर उन्हें रिलायंस फाउंडेशन से काफी मदद के साथ मार्गदर्शन भी मिला। उसके बाद तो कुछ ही महीनों में उनका जीवन ही बदल गया। अब उन्हें कहीं और काम करने की जरूरत महसूस नहीं हो रही। मात्र 5 बीघा जमीन से ही वह अच्छी खासी आमदनी प्राप्त करने की स्थिति में आ गए हैं।
यहां मगर खास बात यह है कि अभी तक डेढ़ बीघा में की गई सब्जियों की खेती से ही नेतराम को भरपूर कमाई हुई है। कमाई भी इतनी, जिसकी उन्हें बिल्कुल भी आशा नहीं थी। यह चमत्कार हुआ है ड्रिप और मल्चिंग सिस्टम अपनाने तथा बताए गए बीज उपयोग करने से।
लोडिंग वाहन बंद हुआ तो खेती का सफर शुरू
आठवीं तक शिक्षित करीब 30 वर्षीय नेतराम सैनी ने बताया कि वह कोरोना महामारी से पहले जिले के ही इंद्रगढ़ में लोडिंग वाहन चलाते थे। गत वर्ष मार्च महीने के आसपास जब कोरोना का प्रकोप शुरू हुआ तो मजबूरी में उन्हें गांव लौट आना पड़ा। कुछ समय बाद यह प्रकोप कम होने पर वे वापस इंद्रगढ़ लौटे, मगर उन्हें अब काम नहीं मिला। करीब एक महीने तक वहां रोजगार पाने के लिए मशक्कत करते रहे। थक हार कर वापस गांव आ गए। यह अगस्त 2020 की बात है। उनके पिता पांचू लाल सैनी के पास 5 बीघा जमीन है। अभी तक वह इस पर गेहूं, सरसों के अलावा थोड़ी सब्जी ही करते थे। नेतराम ने रोजगार का और कोई सहारा नहीं देख इसी जमीन पर कुछ नया करने की सोची। उनके पिता पहले से ही स्वयंसेवी संस्था (एनजीओ) रिलायंस फाउंडेशन के सम्पर्क में थे। वे गांव में होने वाली संस्था की बैठकों में शामिल होते थे। वहां आने के बाद नेतराम ने भी रिलायंस फाउंडेशन से सम्पर्क किया और उनके तरीके से टमाटर की खेती करने की इच्छा जाहिर की।
4 हजार रुपए में तैयार किए 40 ट्रे पौधे
इस पर संस्था की ओर से नेतराम को ड्रिप और मल्चिंग के साथ टोंटी भी उपलब्ध करवाई गई। मगर बीज लोकल मार्केट से ही खरीदे, फिर रिलायंस फाउंडेशन के मार्ग निर्देशन में प्रो ट्रे में इनके पौधे तैयार किए गए। एक ट्रे में तकरीबन 100 पौधे तैयार हो जाते हैं। उस समय 40 ट्रे पौधे तैयार किए गए। इनमें करीब 4000 रुपए खर्च आया। सितम्बर माह में ये पौधे तैयार हो गए। 20 से 30 दिन में यह पौधे तैयार हो जाते हैं। इसके बाद इन्हें एक बीघा खेत में ड्रिप और मल्चिंग बिछाकर रोप दिया गया। अक्टूबर-नवम्बर माह में इनमें टमाटर आने लगे। रोज 10-15 कैरेट टमाटर हो जाते थे। यह सीजन करीब 3 महीने चला, अर्थात इतने समय तक टमाटर आए। टमाटर के भाव उस दौरान पहले 8-10 दिन 350 रुपए प्रति कैरेट, फिर महीने भर 250 रुपए प्रति कैरेट तथा बाकी समय 150 रुपए प्रति कैरेट रहे। इस प्रकार उस दौरान जब बिल्कुल भी कमाई होती नहीं दिख रही थी, नेतराम की अच्छी खासी आमदनी हो गई।
इसी समय आधा बीघा जमीन में अलग से ड्रिप और मल्चिंग से ही मिर्च भी उगा दी। इसके बीज 27 नवम्बर को तैयार किए गए। दिसम्बर माह में तैयार हुए इसके पौधों की रोपाई चालू की गई। करीब दो महीने में इनमें मिर्ची आने लग गई। यह मिर्चियां चार-पांच महीने तक चलीं। समय के अनुसार इनके भाव शुरू में 40 से लेकर अंत में 25 रुपए प्रति किलो के बीच रहे। वहीं जहां तक उपज का सवाल है, कुछ समय तो 1 क्विंटल मिर्च रोज उतरी, बाद में फसल में उतार आते जाने के साथ 60, 50 व 40 किलो रोज हुई।
अभी है खीरा और करेले की खेती
नेतराम सैनी ने बताया कि वर्तमान में तो उनके खेत में आधा बीघा में खीरा और आधा बीघा में करेले उगे हुए हैं। ये खेती भी ड्रिप और मल्चिंग पद्धति से ही की गई है। खीरा आना शुरू हो गए हैं। करेले बारिश होने के 10-15 दिन बाद शुरू हो जाएंगे। इस प्रकार जब तक अन्य किसानों की फसल मार्केट में आएगी, इनके खीरे पहले ही बाजार में पहुंच कर कमाई कर रहे होंगे। उस समय भाव भी काफी अच्छी मिलेंगे, क्योंकि अन्य किसी के खीरे उपलब्ध नहीं होंगे। इस प्रकार इनकी अगेती फसल है। इनके 40 से 45 रुपए किलो तक बिकने की सम्भावना है। इनकी तुड़ाई 7-8 दिन में शुरू हो जाएगी। यह एक दिन छोड़कर एक दिन होती है। वैसे तो सामान्य तरीके से खेती करने पर अभी खीरे की फसल तैयार नहीं हो सकती है।
मिर्च और टमाटर के बीज का इंतजार
नेतराम सैनी बताते हैं कि अब फिर मिर्च और टमाटर के बीज मिलने का इंतजार है। इस बार यह दोनों फसलें एक साथ करेंगे। इनके बीज मिलते ही नर्सरी तैयार करेंगे। पौध तैयार होने पर इनकी रोपाई शुरू हो जाएगी।
पानी की सिंचाई के लिए इनके खेत पर कुंआ बना हुआ है। इनकी जमीन उनियारा बांध के ऊपरी तरफ है, इसलिए उसमें पानी की कमी नहीं रहती है। जहां तक खाद का सवाल है तो नेतराम देसी खाद का ही अधिक प्रयोग करते हैं। जरूरत पड़ने पर दवाइयां भी ऑर्गेनिक ही डालते हैं। इनके परिवार में 70 वर्षीय पिता के अलावा पत्नी व 4 बच्चे है। इनमें एक लड़का व तीन लड़कियां शामिल हैं। एक पुत्री पांचवी व दूसरी पहली कक्षा में पढ़ती है। पुत्र चौथी कक्षा में है। बाकी एक पुत्री अभी काफी छोटी होने से स्कूल जाने लायक नहीं है।
टमाटर के पौधे 6 फीट तक ऊंचे
रिलायंस फाउंडेशन के प्रोजेक्ट मैनेजर मनीष शर्मा ने बताया कि नेतराम सैनी को संस्था की ओर से प्रशिक्षण देकर ड्रिप एवं मल्चिंग लगवाई गई। साथ ही उन्नत किस्म के टमाटर की किस्म हिम शिखर के बारे में बताकर उन्नत नर्सरी तैयार करवाकर पौध तैयार करवाई।
हिम शिखर किस्म के टमाटर के पौधों की ऊंचाई 6 फीट तक हो जाती है। इससे इन्हें बांस गाड़कर व तार बांधकर ऊपर चढ़ाया जाता है। ऐसे एक पौधे से 10-12 किलोग्राम तक टमाटर प्राप्त होते हैं। टमाटर का वजन 70-80 ग्राम होता है l
ड्रिप एवं मल्चिंग तकनीक अपनाने से कम पानी की आवश्यकता होती है। समय एवं श्रम की भी बचत होती है। साथ ही खरपतवार भी नहीं होने से निराई गुड़ाई भी नहीं करनी पड़ती है l नेतराम ने आगे भी नवाचार से सब्जी की खेती करने का निश्चय किया है l मनीष शर्मा ने बताया कि उन्नत तरीके से सब्जियां उगाने से पैदावार अधिक प्राप्त होती है तो आमदनी भी बढ़ती है। नेतराम के इस नवाचार से प्रभावित क्षेत्र के अन्य किसान भी इसे अपनाने लगे हैं।
यह होती है ड्रिप और मल्चिंग
खेत में पौधों के आसपास की मिट्टी को चारों तरफ से प्लास्टिक फिल्म के द्वारा सही तरीके से ढकने की प्रणाली को मल्चिंग कहते हैं। इसी तरह, ड्रिप सिंचाई कम दबाव, उच्च दक्षता वाली सिंचाई प्रणाली होती है, जिसमें फसल में पानी की जरूरतों को पूरा करने के लिए मिट्टी की सतह के नीचे ड्रिप ट्यूब या ड्रिप टेप बिछाकर सिंचाई की जाती है।
शोधकर्ताओं के अनुसार, मल्चिंग के साथ ड्रिप सिंचाई से फसल की पैदावार में बढ़ोतरी के कई कारण हो सकते हैं। इससे खेत में नमी बनी रहती है और मिट्टी से होने वाला वाष्पीकरण भी रुक जाता जाता है।
इसके साथ ही फसल द्वारा पर्याप्त मात्रा में सौर विकिरण अवशोषित किया जाता है और पत्ती के तापमान, वायु आर्द्रता तथा पौधों की वाष्पोत्सर्जन दर में सुधार होता है। इसका एक फायदा यह भी है कि खेत में खरपतवार नहीं उगते और मिट्टी का तापक्रम अधिक होने से हानिकारक कीड़े भी नष्ट हो जाते हैं।
पता-
नाम – नेतराम सैनी
गांव – गम्भीरा
पंचायत समिति – नैनवां
तहसील – नैनवां
जिला – बूंदी
पिन कोड -323801
मोबाइल -9602459010
