अतीक का ऐसा था आतंक : 10 जजों ने केस से खुद को कर लिया था अलग, फिर 11 वें ने सुनाया यह फैसला
एनसीआई@सेन्ट्रल डेस्क
माफिया अतीक अहमद और उसके भाई अशरफ के इस तरह के अंत की उसके दुश्मनों ने भी कल्पना नहीं की होगी। कल शनिवार रात 10.30 बजे करीब इन्हें प्रयागराज मेडिकल कॉलेज में तीन युवकों ने गोलियों से भून डाला। पुलिस उसे यहां मेडिकल जांच के लिए लेकर आई थी।
एक बार सांसद और पांच बार विधायक रहे माफिया अतीक पर 44 साल पहले पहला मुकदमा दर्ज हुआ था। तब से अब तक उसके ऊपर सौ से अधिक मामले दर्ज हुए, लेकिन पहली बार उमेश पाल अपहरण कांड में उसे दोषी ठहराया गया और उम्र कैद की सजा हुई। एक वक्त था जब अतीक के केस की सुनवाई करने तक से जज भी थर्राते थे। उसकी जमानत याचिका पर सुनवाई से 10 जजों ने खुद को अलग लिया था।
यह वाकया वर्ष 2012 का है। उस समय अतीक जेल में बंद था, वहीं उत्तर प्रदेश में विधान सभा चुनाव की घोषणा हो चुकी थी। अतीक ने चुनाव लड़ने के लिए इलाहाबाद हाईकोर्ट में अपनी जमानत के लिए याचिका दायर की। अतीक की इस याचिका पर सुनवाई करने से हाईकोर्ट के 10 जजों ने खुद को अलग कर लिया। 11वें जज ने सुनवाई की तो उन्होंने अतीक की जमानत याचिका मंजूर कर ली। इस पर अतीक ने जेल से बाहर आकर चुनाव लड़ा। हालांकि अतीक इस बार राजू पाल की पत्नी पूजा पाल से चुनाव हार गया।
44 साल पहले अतीक पर दर्ज हुआ था पहला मुकदमा
प्रयागराज के चकिया गांव के तांगा चलाने वाले फिरोज अहमद के घर वर्ष 1962 में एक लड़के का जन्म हुआ। उसका नाम अतीक अहमद रखा गया। फिरोज घर में अकेला कमाने वाला था। उसने जैसे-तैसे पैसों का इंतजाम कर अतीक को पढ़ाना शुरू किया, लेकिन पढ़ाई में उसका मन नहीं लगता था। नतीजा यह हुआ कि वो 10वीं में फेल हो गया। इसके बाद उसने पढ़ाई पूरी तरह छोड़ दी। अब उसे जल्द से जल्द अमीर बनने का चस्का लग गया। लेकिन उसने पैसा कमाने के लिए मेहनत की बजाय, शॉर्टकट को चुना। लूट और अपहरण करके पैसा वसूलने का शॉर्टकट। वो रंगदारी वसूलने के लिए लोगों की हत्या तक करने लगा। साल 1979 में अतीक पर पहली बार एक हत्या का केस दर्ज हुआ।
जेल से बचने के लिए राजनीति का लिया सहारा
अतीक को जेल से बाहर आते ही समझ आ गया कि अब जेल से बचने के लिए राजनीति ही उसके काम आ सकती है। इसलिए उसने राजनीति में कदम रखने का निर्णय लिया। साल 1989 तक अतीक पर करीब 20 मामले दर्ज हो चुके थे। उसका प्रयागराज के पश्चिमी हिस्से पर दबदबा हो गया। 1989 में उसने पहली बार विधायक का चुनाव लड़ने का फैसला किया। किसी पार्टी ने टिकट नहीं दिया तो निर्दलीय खड़ा हो गया।
अतीक के सामने कांग्रेस के गोपालदास यादव प्रत्याशी थे। साथ ही अतीक का बढ़ता दबदबा चांद बाबा को भी अखरने लगा, इसलिए वो भी अतीक को हराने के लिए चुनाव में खड़ा हो गया। नतीजे आए तो अतीक को 25,906 वोट मिले। वह 8,102 वोट से जीतकर पहली बार विधायक बन गया।
दिन दहाड़े, बीच बाजार की चांद बाबा की हत्या
विधायक बनने के करीब तीन महीने बाद अतीक अपने गुर्गों के साथ रोशनबाग में चाय की टपरी पर बैठा था। अचानक चांद बाबा अपने साथियों के साथ वहां आया और दोनों गैंग के बीच गैंगवार शुरू हो गई। पूरा बाजार गोलियों, बम और बारूद से पट गया। इसी गैंगवार में चांद बाबा की मौत हो गई।
कुछ महीनों में एक-एक करके चांद बाबा का पूरा गैंग खत्म हो गया। चांद बाबा के ज्यादातर गुर्गे मार दिए गए, बाकी वहां से भाग गए। चांद बाबा की हत्या का आरोप अतीक अहमद पर लगा, लेकिन विधायक होने की वजह से उस पर कोई एक्शन नहीं लिया गया। चांद बाबा की मौत के पीछे गैंग की मुठभेड़ को कारण बताया गया। अतीक अहमद इस मामले में कभी दोषी साबित नहीं हो पाया।
