April 21, 2024

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पाकिस्तान: अदालत ने ईशनिंदा मामले में हिन्दू प्रोफेसर को किया बरी, पुलिस जांच पर उठाए सवाल

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एनसीआई@सेन्ट्रल डेस्क

पाकिस्तान के सिंध प्रांत के सुक्कुर हाईकोर्ट ने एक हिन्दू प्रोफेसर नूतन लाल को ईशनिंदा के आरोप से बरी कर दिया है। कोर्ट ने अपने फैसले में इस मामले की पुलिस जांच के दौरान कमियों और कमजोरियों की ओर भी इशारा किया है।

अदालत के फैसले में कहा गया कि हिन्दू प्रोफेसर नूतन लाल कभी भी किसी असामाजिक गतिविधियों में शामिल नहीं रहे हैं और उनके खिलाफ धार्मिक घृणा भड़काने या किसी के खिलाफ आपत्तिजनक शब्द कहने का कोई सबूत नहीं है।

अपनी क्लास में प्रोफेसर नूतन लाल।
अपनी क्लास में प्रोफेसर नूतन लाल।

उल्लेखनीय है कि इन हिन्दू प्रोफेसर नूतन लाल पर 2019 में ईशनिंदा का आरोप लगाया गया था। इसके बाद दो साल पहले एक स्थानीय अदालत ने उन्हें आजीवन कारावास की सजा सुनाई थी। प्रोफेसर की बेटी ने बताया कि कोर्ट के फैसले से उन्हें थोड़ी राहत तो मिली है, लेकिन अभी रिहाई नहीं हुई है, जिस कारण फिलहाल स्थिति साफ नहीं हुई है।

उन्होंने कहा, “मेरे पिता की 30 साल की सरकारी सेवा थी। हमारे परिवार पर कभी मुकदमा नहीं किया गया।‌ हम तीन बहनें, एक भाई और मां हैं। हम साल 2019 से परेशानियों का सामना कर रहे हैं।”

बेटी ने बताया, “मेरे 60 वर्षीय पिता को पांच साल की कैद हुई और हमें जान से मारने की धमकियां मिल रही हैं। पिता की तनख्वाह बंद हो गई है और आय का कोई दूसरा जरिया नहीं है।”

पुलिस को यही नहीं पता प्रोफेसर ने क्या कहा था

सिंध हाईकोर्ट ने अपने लिखित फैसले में लिखा कि पुलिस ने जल्दबाजी में जांच की और इसका अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि पूरी जांच सिर्फ एक दिन में पूरी कर ली गई। इसमें 15 गवाहों से पूछताछ, उनके बयानों की रिकॉर्डिंग से लेकर घटनास्थल का दौरा आदि शामिल है।

फैसले के अनुसार, पुलिस ने 15 गवाहों से पूछताछ की, जिनमें से केवल पांच गवाहों ने अपीलकर्ता के खिलाफ आरोपों का समर्थन किया। उनके बयान ज्यादातर एक-दूसरे से मिलते-जुलते हैं, जो इस बात का प्रमाण है कि उनके बयान स्वाभाविक शैली में न होकर पूर्व निर्धारित दिमाग से दिए गए लगते हैं।

हाईकोर्ट ने कहा कि आरोप की गम्भीरता और संवेदनशीलता को देखते हुए यह पुलिस का कर्तव्य था कि वह इसकी जांच में अधिक समय लेते हुए गम्भीर प्रयास करती, लेकिन यह एक पुलिस अधिकारी की जिम्मेदारी से भागने का प्रमुख उदाहरण है।

हाईकोर्ट ने एफआईआर दर्ज करने पर भी सवाल उठाया है। फैसले में कहा गया कि पुलिस को पता नहीं था और एफआईआर में यह जिक्र नहीं था कि अपमानजनक शब्द क्या थे, इसलिए पुलिस की कार्रवाई को घोर लापरवाही के तौर पर देखा जाना चाहिए।

कोर्ट के आदेश के मुताबिक, ऐसे मामलों में एफआईआर दर्ज करने से पहले तथ्यों को ध्यान में रखें, क्योंकि किसी भी व्यक्ति द्वारा समाज में अशांति या अव्यवस्था पैदा करने के किसी भी प्रयास को विफल करना पुलिस का कर्तव्य है।

प्रोफेसर पर ऐसे लगा ईशनिंदा का आरोप

पुलिस के मुताबिक, ईशनिंदा का यह मामला साल 2019 में शुरू हुआ, जब एक हिन्दू प्रोफेसर नूतन लाल (इस स्कूल के मालिक) क्लास में उर्दू विषय पढ़ा रहे थे। कक्षा समाप्त होने के बाद, उनका एक छात्र एक शिक्षक के पास गया और प्रोफेसर पर पैगम्बर मोहम्मद के खिलाफ अभद्र भाषा का इस्तेमाल करने का आरोप लगाया।

शिक्षकों ने मामले को रफा-दफा करने की कोशिश की और हिन्दू प्रोफेसर ने माफी मांगते हुए कहा कि उनका इरादा किसी की धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुंचाना नहीं था, लेकिन इस छात्र ने घटना का जिक्र अपने पिता से किया और फेसबुक पर भी पोस्ट कर दिया, जिसके बाद लोगों में आक्रोश फैल गया।

घटना के बाद स्थानीय बाजार में हड़ताल भी हुई और इस दौरान एक समूह ने स्कूल की इमारत पर हमला किया और तोड़फोड़ की। इसके अलावा एक समूह ने हिन्दू प्रोफेसर नूतन लाल के आवास पर भी हमला किया। वहां के मंदिर पर भी हमला किया गया और तोड़फोड़ की गई।इस घटना के बाद स्थिति तनावपूर्ण होने पर जिला प्रशासन ने रेंजर्स को बुलाया।

घोटकी कोर्ट ने यह सजा दी थी

घोटकी की स्थानीय अदालत ने हिन्दू प्रोफेसर नूतन लाल को आजीवन कारावास और जुर्माने की सजा सुनाई थी। हाल के दिनों में सिंध में यह अपनी तरह की पहली घटना थी, जिसमें किसी हिन्दू नागरिक को ईशनिंदा के आरोप में सजा सुनाई गई थी‌।

कोर्ट ने लिखित फैसले में कहा था कि अभियोजन पक्ष के मुताबिक़, 14 सितम्बर 2019 को शिकायतकर्ता ने घोटकी थाने में मामला दर्ज कराया कि उसका बेटा एक पब्लिक स्कूल में पढ़ता है और उसके प्रोफेसर, जो स्कूल के मालिक भी हैं, ने पैगम्बर का अपमान किया। शिकायतकर्ता के मुताबिक़, उसके बेटे ने दो गवाहों की उपस्थिति में यह बात कही थी।

इस पर घोटकी के अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश ने अपने फैसले में लिखा था कि ‘अभियोजन पक्ष द्वारा पेश किए गए गवाह ‘स्वतंत्र और विश्वसनीय’ थे और उनके बयान ‘द्वेष पर आधारित नहीं थे’ क्योंकि उनमें से किसी की भी अभियुक्त के ख़िलाफ़ व्यक्तिगत दुश्मनी या शत्रुता नहीं थी। ऐसे में उनकी गवाही पर विश्वास नहीं करने का कोई औचित्य नहीं है।’ हालांकि सुक्कुर हाईकोर्ट ने इस फैसले को पलट दिया है।

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