तब भारत में शामिल होना चाहता था नेपाल, पंडित नेहरू ने ठुकरा दिया था राजा त्रिभुवन का प्रस्ताव
राजा त्रिभुवन बीर बिक्रम शाह जब 1951 में विदेश से नेपाल लौटे तो उन्होंने वहां संवैधानिक राजशाही प्रथा की शुरुआत की थी। इसी दौरान उन्होंने चीन की आक्रामकता के खिलाफ पंडित नेहरू से नेपाल का भारत में विलय कराने का अनुरोध किया था।
एनसीआई@सेन्ट्रल डेस्क
1949-50 में चीन में कम्युनिस्ट क्रांति हो चुकी थी। चीन विस्तारवादी नीति के तहत 1950 तक तिब्बत पर कब्जा कर चुका था। उसी दौर में चीन और भारत के बीच स्थित एकमात्र हिन्दू राष्ट्र नेपाल भी राजनीतिक अस्थिरता के दौर से गुजर रहा था। उस वक्त त्रिभुवन बीर बिक्रम शाह नेपाल के राजा थे। चीन की बढ़ती आक्रामकता की वजह से त्रिभुवन बीर बिक्रम शाह चिंतित रहने लगे थे। तब उन्होंने भारत के तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू को प्रस्ताव दिया था कि वह हिमालयी देश नेपाल का विलय भारत में कर लें और उसे एक राज्य बना दें, लेकिन पंडित नेहरू ने ऐसा करने से इनकार कर दिया था।
पूर्व राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी ने अपनी किताब ‘द प्रेसिडेंशियल इयर्स’ में यह बात लिखी है। उन्होंने लिखा है कि नेपाल भारत में अपना विलय चाहता था, लेकिन तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने इस प्रस्ताव को ठुकरा दिया था। मुखर्जी के अनुसार, पंडित नेहरू ने इस प्रस्ताव को यह कहकर ठुकरा दिया था कि नेपाल एक स्वतंत्र राष्ट्र है और उसे ऐसा ही रहना चाहिए।

इंदिरा होतीं तो स्थिति कुछ और होती
अपनी किताब के 11वें अध्याय ‘माई प्राइम मिनिस्टर: डिफरेंट स्टाइल्स, डिफरेंट टेम्परामेंट्स’ शीर्षक के तहत मुखर्जी ने लिखा है, “अगर इंदिरा गांधी, नेहरू की जगह प्रधानमंत्री होतीं तो शायद वह इस अवसर का लाभ उठातीं, जैसा उन्होंने सिक्किम के मामले में किया था।” उन्होंने यह भी लिखा, “हर प्रधानमंत्री की अपनी कार्यशैली होती है। लाल बहादुर शास्त्री ने नेहरू से बिल्कुल अलग रुख अपनाया था। विदेश नीति, सुरक्षा और आंतरिक प्रशासन जैसे मुद्दों पर प्रधानमंत्रियों के बीच, भले ही वे एक ही पार्टी से क्यों न हों अलग-अलग धारणाएं हो सकती हैं।”
पंडित नेहरू ने नेपाल पर अपनाया था यह रुख
प्रणब मुखर्जी ने आगे लिखा है कि पंडित नेहरू ने नेपाल के मुद्दे पर कूटनीतिक रुख अपनाते हुए काम किया था। वो लिखते हैं, “नेपाल में राणाओं के राज को राजशाही से बदल दिया गया था, जबकि नेहरू चाहते थे कि वहां भी लोकतांत्रिक शासन व्यवस्था हो।” किताब में लिखा गया है कि नेहरू ने तब राजा त्रिभुवन से कहा था कि नेपाल एक स्वतंत्र राष्ट्र है और उसे ऐसा ही रहना चाहिए।” यह अलग बात है कि प्रणब मुखर्जी के इस दावे को कुछ स्तरों पर गलत और पंडित नेहरू की छवि को बिगाड़ने के लिए गढ़ा गया बताया जाता है।
उल्लेखनीय है कि 1846 से 1951 तक नेपाल पर राणा शासकों का शासन था। इस दौरान नेपाल पूरी दुनिया से कटा रहा। 1949 में नेपाल के पड़ोसी चीन में कम्युनिस्ट क्रांति हुई तो यहां भी सत्ता में परिवर्तन हुआ। उस वक्त तक त्रिभुवन बीर बिक्रम शाह विदेश में थे। जब 1951 में वह नेपाल लौटे तो उन्होंने वहां संवैधानिक राजशाही प्रथा की शुरुआत की थी। इसी दौरान उन्होंने चीन की आक्रामकता के खिलाफ पंडित नेहरू से नेपाल का भारत में विलय कराने का अनुरोध किया था।
