अंता में त्रिकोणीय संग्राम: उपचुनाव के लिए बीजेपी ने मोरपाल सुमन को बनाया उम्मीदवार, कांग्रेस के प्रमोद जैन भाया व निर्दलीय नरेश मीणा से होगा मुकाबला
एनसीआई@कोटा/जयपुर
बारां जिले की अंता विधानसभा सीट पर होने वाले उपचुनाव के लिए भारतीय जनता पार्टी ने मोरपाल सुमन को अपना उम्मीदवार घोषित किया है। मोरपाल वर्तमान में बारां पंचायत समिति के प्रधान हैं। वह स्थानीय होने के साथ ही धरती से जुड़े, बेहद सामान्य नेता के रूप में जाने जाते हैं। बताया गया है कि मोरपाल का नाम कई महीनों के मंथन और नेताओं से विचार-विमर्श के बाद तय किया गया। जातिगत समीकरण व आंकड़ों को भी जांचा-परखा गया।
अंता में माली समाज के लोगों की बहुलता है। मोरपाल इसी जाति के हैं। मोरपाल को पूर्व मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे का नजदीकी नेता माना जाता है। इस सीट पर कांग्रेस ने पूर्व मंत्री प्रमोद जैन भाया को उम्मीदवार बनाया है। इसके अलावा, नरेश मीणा निर्दलीय उम्मीदवार के रूप में चुनाव में उतरे हैं। ऐसे में अंता विधानसभा में त्रिकोणीय मुकाबले की स्थिति बन रही है।
इसलिए हो रहा यह उपचुनाव
अंता विधानसभा सीट पिछले साल मई में खाली हुई थी। पूर्व विधायक कंवरलाल मीणा की विधायकी 20 साल पुराने मामले में सजा होने के बाद रद्द कर दी गई थी। कंवरलाल पर एसडीएम के खिलाफ पिस्टल तानने का आरोप था, जिसके चलते उनकी सदस्यता समाप्त हुई। इसके बाद इस सीट पर छह महीने के भीतर उपचुनाव आयोजित करना अनिवार्य हो गया।
मतदाताओं की संख्या
अंता विधानसभा क्षेत्र में कुल 2 लाख 26 हजार 227 वोटर हैं। इनमें 1 लाख 15 हजार 982 पुरुष, 1 लाख 10 हजार 241 महिलाएं और 4 अन्य वोटर हैं। उपचुनाव की तैयारियों के लिए वोटर लिस्ट में अपडेशन अभियान भी चलाया गया, जिसमें 1,336 नए वोटर जुड़े। अंतिम मतदाता सूची 1 अक्टूबर को प्रकाशित हुई थी, जिससे सभी दलों को आगामी चुनाव में रणनीति बनाने में मदद मिली।
राजस्थान में पिछले कुछ सालों में हुए उपचुनावों के रुझानों को देखें तो इनमें बीजेपी का प्रदर्शन बेहतर रहा है। बीजेपी ने अब तक हुए सात उपचुनावों में पांच सीटें जीतकर अपनी ताकत दिखाई है, जबकि कांग्रेस को केवल एक सीट पर सफलता मिली। खींवसर, देवली-उनियारा, झुंझुनूं, रामगढ़ और सलूम्बर में बीजेपी की जीत हुई थी। वहीं कांग्रेस और हनुमान बेनीवाल की पार्टी आरएलपी को इन चुनावों में भारी नुकसान उठाना पड़ा।
अंता उपचुनाव का परिणाम राज्य की बीजेपी सरकार के स्थायित्व पर तो प्रत्यक्ष रूप से कोई प्रभाव नहीं पड़ेगा, लेकिन यह राजनीतिक माहौल और जनता के नजरिए को प्रभावित जरूर करेगा। अगर बीजेपी यहां जीत दर्ज करती है तो इसे सरकार के कामकाज की छवि पर जनता की मुहर के रूप में देखा जाएगा। वहीं, अगर कांग्रेस या निर्दलीय उम्मीदवार विजयी होते हैं, तो विपक्ष के लिए हमलावर होने का अवसर बनेगा।
यह है जातिगत समीकरण
अंता विधानसभा क्षेत्र में करीब 2.26 लाख मतदाता हैं। इनमें माली समाज के लगभग 40 हजार, अनुसूचित जाति के 35 हजार और मीणा समुदाय (अनुसूचित जनजाति) के 30 हजार मतदाता हैं। इसके अलावा धाकड़, ब्राह्मण, बनिया और राजपूत समाज के वोट भी हैं।
जातीय खींचतान मुकाबले की दिशा तय करेगी
यह क्षेत्र माली समाज बहुल है, लेकिन अकेले उनके वोट से जीत सम्भव नहीं। माली और मीणा वोट जिस तरफ एकजुट होते हैं, उसी दल की जीत तय होती है। भाजपा को परम्परागत रूप से माली और शहरी वोटों का समर्थन मिलता रहा है। जबकि कांग्रेस मीणा और एससी समुदाय पर भरोसा करती आई है। पूर्व विधायक प्रमोद जैन भाया एक बार फिर मैदान में हैं। इस बार दोनों दलों के बीच यही जातीय खींचतान मुकाबले की दिशा तय करेगी।
नरेश मीणा दोनों ही दलों के वोट बैंक में सेंध लगाएंगे
भाजपा ने मोरपाल सुमन के जरिए स्थानीय और माली दोनों समीकरणों को साधने का प्रयास किया है, लेकिन निर्दलीय उम्मीदवार के रूप में नरेश मीणा दोनों ही दलों के वोट बैंक में सेंध लगाने की रणनीति में हैं।
