April 25, 2026

News Chakra India

Never Compromise

मुख्तार अंसारी खरीदना चाहता था सेना से चुराई लाइट मशीन गन, रची थी यह खौफनाक साजिश

मुख्तार अंसारी खरीदना चाहता था सेना से चुराई लाइट मशीन गन, रची थी यह खौफनाक साजिश

एसटीएफ सीओ के तौर पर तैनात रहे शैलेन्द्र सिंह चाहते हैं कि मुख्तार अंसारी से जुड़ा एक पुराना केस रीओपन किया जाए। असल में मुख्तार अंसारी सेना से चुराई गई लाइट मशीन गन (LMG) किसी भी कीमत पर खरीदना चाहता था, इसलिए अंसारी पर पोटा भी लगने वाला था। जानिए इस मामले की पूरी कहानी-

एनसीआई@नई दिल्ली

विधायक रहे कृष्णानंद राय की हत्या से जुड़े गैंगस्टर मामले में मुख्तार अंसारी को 10 साल की सजा हुई है। इसी बीच मुख्तार अंसारी की वजह से अपनी नौकरी गंवाने वाले एसटीएफ के पूर्व डीएसपी रहे शैलेन्द्र सिंह ने अपनी इच्छा जाहिर की है। वह चाहते हैं कि मुख्तार अंसारी के उस मामले को दोबारा खोला जाए जिसमें उन्होंने मुख्तार के खिलाफ पोटा कानून लगाया था। सवाल है कि शैलेन्द्र ऐसा क्यों चाहते हैं?

इस रहस्य से पर्दा उठना जरूरी

शैलेन्द्र सिंह चाहते हैं कि सेना से चुराई लाइट मशीनगन खरीदने के मुख्तार के उस मामले को दोबारा अदालत में खोला जाए, ताकि उस रहस्य से भी पर्दा उठ सके कि कैसे सेना से चुराए गए हथियार मुख्तार तक पहुंचते थे। ये कहानी सिर्फ इतनी भर नही है कि सेना से लाइट मशीन गन चोरी हुई, इस कहानी में तीन सवाल और उनके जवाब सामने आएंगे।

•पहला सवाल, आखिर कैसे, मुख्तार अंसारी पर पोटा की आंच पहुंची थी?
•दूसरा सवाल, कैसे तत्कालीन मुलायम सिंह की सरकार ने मुख्तार के खिलाफ पोटा को मंजूरी नहीं दी?
•तीसरा सवाल, मुख्तार के दबाव में शैलेन्द्र सिंह को अपनी नौकरी क्यों गंवानी पड़ी?

दरअसल मुख्तार अंसारी, कृष्णानंद राय की हत्या के मूल मामले से बरी हो चुका है। यह हत्याकांड नवम्बर 2005 में हुआ था। इसके पहले मुख्तार ने जनवरी 2004 में ही कृष्णानंद राय को मारने के लिए सेना की एक लाइट मशीन गन को खरीदने की योजना बनाई और इसके लिए उसने 2004 में आर्मी के एक भगोड़े से चुराई गई लाइट मशीन गन खरीदने की डील भी की थी।

ये कहानी कुछ यूं शुरू होती है…

तत्कालीन एसटीएफ सीओ के तौर पर शैलेन्द्र सिंह वाराणसी में तैनात थे। उन्हें मुख्तार अंसारी और कृष्णानंद राय के गैंगवार पर नजर रखने के लिए तैनात किया गया था। इसी तैनाती के दौरान शैलेन्द्र सिंह ने जब मुख्तार के फोन को टेप करना शुरू किया तो एक खतरनाक कहानी सामने आई। शैलेन्द्र सिंह ने वह ऑडियो रिकॉर्ड किया, जिसमें मुख्तार अंसारी सेना के एक भगोड़े से लाइट मशीन गन खरीदने का डील कर रहा था।

मुख्तार अंसारी के फोन हो रहे थे रिकॉर्ड

एसटीएफ तब मुख्तार अंसारी के फोन को रिकॉर्ड कर रही थी। मुख्तार और सेना के इस भगोड़े की बातचीत का टेप आज भी अदालत की कार्यवाही में मौजूद है। यह टेप अपने आप में इतना विस्फोटक था कि उस लाइट मशीन गन की बरामदगी के बाद शैलेन्द्र सिंह ने मुख्तार अंसारी पर पोटा कानून लगा दिया और यहीं से मुलायम सरकार की नजरें डीएसपी शैलेन्द्र सिंह पर टेढ़ी हो गईं और अंततः शैलेन्द्र को अपनी नौकरी छोड़नी पड़ी।

सीएम योगी से की थी केस री-ओपेन की बात

शैलेन्द्र सिंह के अनुसार ‘लखनऊ में 2004 में मुख्तार और कृष्णानंद राय के बीच गैंगवार हुई थी। आपस में गोलियां चलीं और तब एसटीएफ को इन पर नजर रखने के लिए जिम्मेदारी दी गई थी। ये दोनों पूर्वांचल से आते थे, दोनों एक-दूसरे के जानी दुश्मन थे और मैं भी पूर्वांचल चंदौली का रहने वाला हूं। ऐसे में मुझे मुख्तार और कृष्णानंद राय दोनों पर निगरानी की जिम्मेदारी थी, ताकि कोई खूनी गैंगवार न हो जाए। ‘

फोन टेप होने से हुआ था खुलासा

शैलेन्द्र कहते हैं कि, इसी निगरानी के क्रम में जब मैं मुख्तार अंसारी का फोन सुन रहा था, तब वह सेना के भगोड़े बाबूलाल यादव से एलएमजी खरीदने की बात कर रहा था। बाबूलाल कह रहा था कि मेरे पास सेना से चुराई हुई लाइट मशीन गन है, जो राष्ट्रीय राइफल से चुराई गई थी। यह सौदा लगभग एक करोड़ रुपए में तय हो गया था।

इसलिए रची जा रही थी खौफनाक साजिश

जब मुख्तार अंसारी अपने लोगों से बात कर रहा था और वह फोन भी रिकॉर्ड हो रहा था तब उसने कहा था कि उसे हर हाल में यह लाइट मशीन गन चाहिए और उसकी वजह भी वह बताता था कि कृष्णानंद राय की गाड़ी बुलेट प्रूफ है और उस पर इसकी राइफल का कोई असर नहीं होगा। अगर लाइट मशीन गन उसे मिल जाए तो वह उसकी बुलेट प्रूफ गाड़ी को भेद सकती है और उसे मारा जा सकता है।

मुख्तार तक पहुंचने से पहले बरामद करनी थी एलएमजी

खास बात यह है कि इस पूरे ऑपरेशन की जिम्मेदारी खुद आरके विश्वकर्मा ने दी थी, जो कि तब बनारस में एसटीएफ के एसपी थे और आज राज्य के डीजीपी है। उन्होंने ही शैलेन्द्र को यह जिम्मेदारी दी थी कि हर हाल में इस लाइट मशीन गन को मुख्तार के पास पहुंचने से पहले बरामद करना है, क्योंकि अगर यह मुख्तार के पास पहुंच गई तो फिर इसे बरामद करना असम्भव हो जाएगा।

24 घंटे में बरामद करनी थी लाइट मशीन गन

यह लाइट मशीन गन 24 घंटे के अंदर बरामद करनी थी, क्योंकि मुख्तार से बाबूराम यादव की डील हो चुकी थी। पुलिस को मालूम था कि अगर यह एक बार मुख्तार के मोहम्मदाबाद स्थित घर के भीतर चली गई तो फिर किसी भी कीमत पर पुलिस उसे बरामद नहीं कर पाएगी। शैलेन्द्र बताते हैं कि ‘तत्काल हम लोगों ने ऑपरेशन लांच किया। हमने बाबू लाल यादव को उठाया तो पता ये चला कि उसने अपने मामा जो कि मुख्तार का पुराना साथी रह चुका था उसके पास एलएमजी छुपा कर रखी है। जान पर खेलकर हम लोगों ने इसे बरामद किया।

शैलेंद्र बताते हैं कि “मुख्तार अंसारी हर हाल में कृष्णानंद राय को मार देना चाहता था और उसे लग रहा था कि कृष्णानंद राय की बुलेट प्रूफ गाड़ी सबसे बड़ी अड़चन है। एके-47 या उसकी राइफल अचूक नहीं थे। ऐसे में अपने लोगों से बातचीत में उसने हर हाल में इस लाइट मशीन गन को लेने की बात कही थी और वह लगभग इसे ले चुका था। ‘

फाइनली जब मैंने इसे रिकवर किया तो वादी के रूप में बनारस के चौबेपुर थाने में मैंने यह मामला दर्ज कराया। सम्बन्धित धाराओं में यह मामला दर्ज हुआ, लेकिन मामला सेंसेटिव था। सेना से चुराई लाइट मशीन गन थी, कश्मीर से लाई गई थी और मुख्तार के हाथों में पहुंचने वाली थी, इसलिए हमने आर्म्स एक्ट के साथ-साथ इसमें पोटा भी लगाया और यहीं से पूरा मामला बिगड़ गया। मुख्तार अंसारी को लग चुका था कि पोटा लगने से उसकी मुसीबत काफी बढ़ जाएगी और वह इससे निकल नहीं पाएगा।

सियासत ऐसे बनी सहयोगी

दरअसल तब की सियासत इसके मुफ़ीद थी। मायावती की सरकार तोड़कर मुलायम सिंह यादव ने सरकार बनाई थी। तब मुख्तार अंसारी कई निर्दलीय विधायकों के साथ सरकार को समर्थन दे रहा था और यहीं उसने मुलायम सिंह यादव पर दबाव बनाया। मुलायम सिंह यादव कतई नहीं चाहते थे कि मुख्तार पर पोटा लगे, इस मामले में एक साथ दर्जनों ट्रांसफर मुलायम सिंह यादव ने कर दिए।

बंद कर दी गई बनारस की एसटीएफ यूनिट

यहां तक कि बनारस की एसटीएफ यूनिट को भी बंद कर दिया और यह मैसेज साफ हो गया कि इसमें बीच का रास्ता कुछ नहीं है। मुख्तार को हर हाल में पोटा से बाहर निकालना है, दूसरी तरफ मेरे ऊपर भी दबाव था। वो एफआईआर बदलना चाहते थे। मैंने एफआईआर बदलने से मना कर दिया। लोगों ने कहा कि आप इन्वेस्टिगेशन में नाम मत लेना उनका, लेकिन सब कुछ जुटाया हुआ साक्ष्य मेरा ही था तो मैं अड़ा रहा और मैंने पीछे हटने से मना कर दिया। इसकी कीमत मैंने अपनी नौकरी देकर चुकाई।

जब सब तरफ से समझाने की कोशिश भी बेकार हो गई और मैंने भी फैसला कर लिया कि मैं इस मुद्दे पर पीछे नहीं हटूंगा। तब मैंने भी त्याग पत्र लिखा और त्यागपत्र में मैंने साफ लिखा कि जब सरकार का फैसला मुख्तार अंसारी कर रहा हो तो यहां मेरे लिए काम करना मुश्किल है।

More Stories

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

You may have missed

Copyright © All rights reserved. | Newsphere by AF themes.