एएसआई की रिपोर्ट से बड़ा खुलासा: ज्ञानवापी मस्जिद पुराने मंदिर के अवशेषों पर बनाई गई, खंडित मूर्तियां और हिन्दू साक्ष्यों के प्रमाण मिले
भारतीय पुरातात्विक सर्वेक्षण (एएसआई) की सर्वेक्षण रिपोर्ट से संकेत मिला है कि ज्ञानवापी मस्जिद वहां पहले से मौजूद एक पुराने मंदिर के अवशेषों पर बनाई गई थी। एएसआई सर्वे के बाद आई रिपोर्ट में खंडित मूर्तियां और हिन्दू साक्ष्य के प्रमाण तस्वीरों में दिखाई पड़ रहे हैं।
एनसीआई@नई दिल्ली
ज्ञानवापी मस्जिद को लेकर आर्कियोलॉजिकल सर्वे ऑफ इंडिया (एएसआई) की 839 पन्नों की रिपोर्ट सामने आ गई है। इससे पहली बार ज्ञानवापी के भीतर का सच वैज्ञानिक तथ्यों के आधार पर सामने आया है। कुल 32 बिंदू ऐसे हैं जो मंदिर पक्ष के लोगों के दावों की पुष्टि करते हैं।

जीपीआर सर्वे पर एएसआई ने कहा है कि यहां पर एक बड़ा भव्य हिन्दू मंदिर था, अर्थात ढांचे यानी मस्जिद के पहले एक बड़ा हिन्दू मंदिर यहां मौजूद था। एएसआई की सर्वे रिपोर्ट में मंदिर होने के 32 से ज्यादा प्रमाण मिलने की बात कही गई है। बताया गया है कि 32 ऐसे शिलालेख मिले हैं जो पुराने हिन्दू मंदिरों के हैं। एएसआई की रिपोर्ट कहती है कि हिन्दू मंदिर के खम्भों को थोड़ा बहुत बदलकर नए ढांचे के लिए इस्तेमाल किया गया।
एएसआई के मुताबिक, वर्तमान में जो ढांचा है उसकी पश्चिमी दीवार पहले के बड़े हिन्दू मंदिर का हिस्सा है और पिलर के नक्काशियों को मिटाने की कोशिश की गई। हिन्दू पक्ष के मुताबिक, वह जो दलीलें दे रहा था, उसकी तस्दीक एएसआई के सर्वे में मिले सबूत करते हैं। इस सर्वे रिपोर्ट के कुछ अंश सामने आए हैं, जिन्होंने एक बार अयोध्या फैसले की याद दिला दी है। हिन्दू पक्ष को उम्मीद है कि जिस तरह कानूनी लड़ाई के बाद अयोध्या का फैसला उसके हक में आया, उसी तरह से यह अदालती फैसला भी उसके पक्ष में आएगा। सर्वेक्षण रिपोर्ट में मंदिर के अस्तित्व के पर्याप्त सबूत मिलने की बात कही गई है, जिस पर मस्जिद का निर्माण किया गया था।
जिन क्षेत्रों का अवलोकन और वैज्ञानिक परीक्षण करने के बाद भारतीय पुरातात्विक सर्वेक्षण (एएसआई) इस निष्कर्ष पर पहुंचा है कि ज्ञानवापी मस्जिद के निर्माण से पहले वहां एक बड़ा हिन्दू मंदिर मौजूद था, वो इस प्रकार हैं-
• मस्जिद से पहले वहां बने मंदिर में बड़ा केन्द्रीय कक्ष और उत्तर की ओर छोटा कक्ष था।
• मौजूदा ढांचे में पहले से मौजूद संरचना का केन्द्रीय कक्ष और मुख्य प्रवेश द्वार।
• मस्जिद का पश्चिमी कक्ष और पश्चिमी दीवार।
• मस्जिद के निर्माण में मंदिर के खम्भों के साथ ही अन्य हिस्सों में थोड़ा बहुत बदलाव कर इसे मस्जिद का आकार दिया गया।
• मौजूदा ढांचे पर अंकित शिलालेख।
• पत्थरों पर अरबी और फ़ारसी के शिलालेख।
• तहखानों में मूर्तिकला के अवशेष।

केन्द्रीय कक्ष और मुख्य प्रवेश द्वार में यह मिला
मंदिर में पहले एक बड़ा केन्द्रीय कक्ष था और उत्तर, दक्षिण, पूर्व और पश्चिम में भी कम से कम एक कक्ष था। इनमें से तीन कक्ष (उत्तर, दक्षिण और पश्चिम) के अवशेष अभी भी मौजूद हैं, लेकिन पूर्व में स्थित कक्ष के अवशेषों का पता नहीं लगाया जा सका है। वह विशेष क्षेत्र पत्थर के फर्श वाले एक मंच के नीचे ढका हुआ है, जो मंदिर का केन्द्रीय कक्ष था, वह अब मस्जिद का केन्द्रीय कक्ष है। सजाए गए मेहराबों के निचले सिरों पर उकेरी गई जानवरों की आकृतियों को क्षतिग्रस्त कर दिया गया था और गुम्बद के अंदरूनी हिस्से को ज्यामितीय डिजाइनों से सजाया गया था।
मंदिर के इस केन्द्रीय कक्ष का मुख्य प्रवेश द्वार पश्चिम से था। इसे पत्थर की चिनाई से बंद कर दिया गया था। प्रवेश द्वार को जानवरों, पक्षियों की नक्काशी से सजाया गया था। प्रवेश द्वार को ईंटों, पत्थरों से बंद कर दिया गया था। इस प्रवेश द्वार की चौखट पर उकेरी गई किसी पक्षी की आकृति के अवशेष पाए गए गए हैं।
पश्चिमी कक्ष और पश्चिमी दीवार में यह पाया गया
पश्चिमी कक्ष का पूर्वी आधा भाग अभी भी मौजूद है, जबकि पश्चिम का आधा हिस्सा नष्ट हो चुका है। पश्चिमी का एक गलियारा उत्तर, दक्षिण कक्षों से जुड़ा हुआ था। पश्चिमी दीवार पहले से मौजूद मंदिर का हिस्सा है।

खम्भों और स्तम्भों पर यह मिला
यहां स्थित खम्भों और पायलटर्स को मोडिफाई किया गया है, जो मूल रूप से हिन्दू मंदिर का हिस्सा थे। उनके पुन: उपयोग के लिए उन पर उकेरी गई आकृतियों को क्षतिग्रस्त कर दिया गया और उनकी जगह फूलों के डिज़ाइन लगा दिए गए।
जनार्दन, रुद्र और उमेश्वर…
मौजूदा और पहले से मौजूद ढांचे में 34 शिलालेख पाए गए थे। इनमें से 32 शिलालेखों की प्रतिकृतियां बनाई गईं। शिलालेख देवनागरी, ग्रंथ, तेलुगु और कन्नड़ लिपियों में पाए गए हैं। देवताओं के तीन नाम – जनार्दन, रुद्र और उमेश्वर भी पाए गए। महामुक्ति मंडप जैसे शब्दों का उल्लेख तीन शिलालेखों में किया गया है। मस्जिद में शिलालेखों के फिर से किए गए उपयोग से पता चलता है कि मस्जिद के निर्माण में पहले की संरचनाओं को नष्ट कर दिया गया था और इसके हिस्सों का पुन: उपयोग किया गया था।
एक पत्थर पर अंकित शिलालेख से पता चलता है कि औरंगजेब के शासनकाल (1676-77) के दौरान मस्जिद का निर्माण किया गया था। शिलालेख में यह भी कहा गया है कि 1792-93 में मस्जिद की मरम्मत की गई थी। एएसआई ने औरंगजेब की जीवनी का हवाला देते हुए कहा है कि 2 सितम्बर, 1669 को औरंगजेब ने काशी में विश्वनाथ के मंदिर को ध्वस्त करने का आदेश जारी किया था।
तहखानों में मिले मूर्तिकला अवशेष
एएसआई का कहना है कि एक तहखाने में फेंकी गई मिट्टी के नीचे हिन्दू देवताओं की मूर्तियां और नक्काशीदार वास्तुशिल्प अवशेष दबे हुए पाए गए। ग्राउंड पेनेट्रेटिंग रडार (जीपीआर) प्रौद्योगिकी के उपयोग पर एएसआई का कहना है कि उत्तरी हॉल में जीपीआर सर्वेक्षण से संकेत मिलता है कि उत्तरी दरवाजे की ओर फर्श में एक गुफानुमा आकृति थी। दक्षिण गलियारे में तहखाने के स्तर की ओर एक आयताकार मार्ग (एक दरवाजे या एक प्रकार का प्रवेश मार्ग) भी था। गलियारों से सटे हुए चौड़े तहखाने (चौड़ाई 3-4 मीटर) भी पाए गए हैं। एक तहखाने में 2 मीटर चौड़ा कुआं ढक दिया गया था।

एएसआई का निष्कर्ष
कला और वास्तुकला के आधार पर, पूर्व-मौजूदा ढांचे को एक हिन्दू मंदिर के रूप में पहचाना जा सकता है। ऐसा प्रतीत होता है कि मस्जिद का निर्माण औरंगजेब के शासनकाल के 20 वें वर्ष में किया गया था और पहले से मौजूद मंदिर 17 वीं शताब्दी में औरंगजेब के शासनकाल के दौरान नष्ट कर दिया गया प्रतीत होता है। पहले से मौजूद मंदिर के एक हिस्से को फिर से बनाया गया था और मस्जिद में पुन: उपयोग किया गया।
उल्लेखनीय है कि सन् 1991 में लार्ड विश्वेश्वर नाथ का मुकदमा दाखिल करके पहली बार पूजा पाठ की अनुमति मांगी गई। इसके बाद सन् 1993 में इलाहाबाद हाईकोर्ट ने यथास्थिति बनाए रखने का आदेश पारित किया।
बीएचयू के पूर्व पुरातत्वविद और इतिहासकार अनंत सदाशिव अल्टेकर सन् 1936 में ही अपनी किताब में ज्ञानवापी में ऐसी संरचना का जिक्र कर चुके हैं। बीएचयू के पुरातत्विद और इतिहासकार डॉ. अल्टेकर ने अपनी एक किताब में ज्ञानवापी परिसर के पहले मौजूद मंदिर के नक्शे का जिक्र किया था। एएसआई की रिपोर्ट में अब जो बातें सामने आई हैं, इससे अल्टेकर की बातों की वैज्ञानिक पुष्टि हो गई है।

फर्जी इतिहासकार के चक्कर में न पड़ें
एएसआई की रिपोर्ट आने के बाद संत समिति ने एएसआई का अभिनंदन किया। संत समिति के महामंत्री स्वामी जितेन्द्रानंद ने बताया कि मुस्लिम पक्ष इसी तरीके से अयोध्या में भी फर्जी इतिहासकारों के चक्कर में पड़ा था। काशी विश्वनाथ के मामले में भी ऐसा ही हो रहा है। जबकि इतिहासकार यदुनाथ सरकार, तत्कालीन जिलाधिकारी जोसफ प्रिसले और बीएचयू के पुरातत्वविद डॉ. एएस अल्टेकर ने 1936 और 1947 में ही एक नक्शे का जिक्र किया था। इसके अधिकांश हिस्सों की पुष्टि आज सर्वे रिपोर्ट में वैज्ञानिक तथ्यों के साथ हुई है। सर्वे की रिपोर्ट इतिहासकार और पुरातत्वविद के दावे की पुष्टि करती है। अब ये बड़ा वैज्ञानिक आधार संवैधानिक आधार भी बनेगा।
