July 13, 2026

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त्वरित प्रतिक्रिया: जातिगत जनगणना के आंकड़ों पर लिए जाने वाले फैसले से तय‌ होगा भारत का भविष्य, यह विध्वंसक भी हो सकता है

त्वरित प्रतिक्रिया: जातिगत जनगणना के आंकड़ों पर लिए जाने वाले फैसले से तय‌ होगा भारत का भविष्य, यह विध्वंसक भी हो सकता है

राजीव सक्सेना

आजाद भारत की पहली केबिनेट ने निर्णय लिया था-‘हम जातिगत जनगणना नहीं कराएंगे, क्योंकि यह समाज के लिए विभाजनकारी हो सकता है।’ बड़ी बात यह है कि इस फैसले को लेने वालों में तब के प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू, सरदार पटेल व मौलाना आजाद के साथ डॉ. भीमराव अम्बेडकर भी शामिल थे। इसके बावजूद खुद को अम्बेडकरवादी कहने वाले नेता व राजनीतिक पार्टियां समय-समय पर राजनीतिक हित के लिए जातिगत जनगणना की मांग उठाती रहीं। यह अलग बात है कि ये ही पार्टियां खुद ऐसा करने से कमोबेश कन्नी काटती रहीं।

अब ऐसे में केन्द्र की बीजेपी नेतृत्व वाली एनडीए सरकार के द्वारा लिया गया जातिगत जनगणना का फैसला उसकी राजनीतिक मजबूरी है। इसके आधार पर आगे जो निर्णय लिए जाएंगे, उन पर ही देश का भविष्य निर्भर करेगा। जिसकी जितनी संख्या, उसकी उतनी हिस्सेदारी…. फॉर्मूले को अपनाया गया तो प्रतिभाएं कुंठित हो जाएंगी। योग्य-प्रतिभाशाली व्यक्तियों के सामने फिर देश छोड़ने के अलावा और कोई रास्ता नहीं बचेगा। युवा यह सोचने लग जाएंगे कि योग्यता बढ़ाने से फायदा तब ही होगा, जब वह जिस जाति में जन्मे हैं, उसके लोगों की संख्या ज्यादा हो, वरना इससे ज्यादा कुछ होने वाला नहीं।

पहले ही आरक्षण व्यवस्था के कारण योग्यताएं…. अपने से काफी कम योग्य व्यक्तियों के अधीन काम करने को मजबूर हैं। इससे देश को हो रहे भयंकर नुकसान का आंकलन चीन व जापान जैसे देशों के विकास को देखकर लगाया जा सकता है। जातिगत जनगणना के इस फैसले के लिए प्रमुख रूप से कौन से नेता और राजनीतिक पार्टियों दोषी हैं? यह सब जानते हैं। मगर त्रासदी यह है कि राष्ट्र विध्वंस ऐसी राजनीतिक पार्टियों के साथ आज बड़ा समर्थन है। बीजेपी को, प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को, इसी दबाव को कम करने के लिए यह विध्वंसक फैसला लेना पड़ा।

जनगणना और जातिगत जनगणना का इतिहास

ब्रिटिश हुकूमत के वक्त देश में पहली बार 1872 में जनगणना हुई और तब से हर 10 साल में जनगणना होती है। हालांकि, 2021 में कोरोना महामारी की वजह से यह सिलसिला टूट गया और अब इसे कराए जाने की तैयारी है।

1931 में आखिरी बार हुई थी जातिगत जनगणना

देश में 1931 में जातीय जनगणना हुई तो कुल जातियों की संख्या 4,147 थी और फिर जब 2011 में जनगणना हुई तो देश में 46 लाख जातियों की संख्या निकली। हालांकि, 2011 की जनगणना के आंकड़े उजागर नहीं किए गए हैं। तीन साल पहले ही केन्द्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में एक केस के सिलसिले में इन आंकड़ों का जिक्र किया था।

1872 से 1931 तक जितनी बार जनगणना हुई, उसमें जातिवार आंकड़े भी दर्ज किए गए। 1901 में जातीय जनगणना हुई तो 1,646 अलग-अलग जातियों की पहचान की गई। इसके बाद 1931 में यह संख्या बढ़कर 4,147 हो गई। 1980 में मंडल आयोग की रिपोर्ट का आधार भी यही संख्या थी। 1941 में भी जाति जनगणना हुई, लेकिन आंकड़े प्रकाशित नहीं हुए।

1951 में बदल गया जनगणना का तरीका

आजादी के बाद 1951 में जब पहली जनगणना हुई तो ब्रिटिश शासन वाली जनगणना के तरीके में बदलाव कर दिया गया और जातिगत आंकड़ों को सिर्फ अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति तक सीमित कर दिया गया। यानी ओबीसी और दूसरी जातियों का डेटा नहीं दिया जा रहा है। जनगणना का ये ही स्वरूप कमोबेश अभी तक चला आ रहा है।

2011 में जातीय जनगणना का डेटा नहीं हुआ सार्वजनिक

साल 1961, 1971, 1981, 1991, 2001 में जो भी जनगणना हुई, उसमें सरकार ने जातिगत जनगणना से दूरी बनाए रखी। इस दौरान जिन राजनीतिक पार्टियों की सरकारें रहीं, उनकी ही यह नीति रही। यह‌ अलग‌ बात है कि वे राजनीतिक पार्टियां आज अलग भाषा बोल रही हैं।

2011 की जनगणना में पहली बार जाति आधारित आंकड़े (सामाजिक आर्थिक जातिगत) भी एकत्र किए गए, लेकिन यह डेटा सार्वजनिक नहीं किया गया। साल 2021 में जनगणना प्रस्तावित थी, लेकिन कोरोना महामारी के चलते इसे टाल दिया गया। पिछले 150 साल में ऐसा पहली बार हुआ, जब समय पर जनगणना नहीं हो पाई।

सार्वजनिक क्यों नहीं किया गया डेटा?

साल 2021 में केन्द्र सरकार ने एक मामले की सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट में हलफनामा दिया था और बताया था कि साल 2011 में जो सामाजिक आर्थिक और जातिगत जनगणना हुई, उसमें कई कमियां थीं। जो आंकड़े एकत्रित किए गए, उसमें काफी गलतियां और अशुद्धियां हैं।‌ऐसे में उन पर भरोसा या उनका इस्तेमाल नहीं किया जा सकता है।

यह है जनगणना का गजब आंकड़ा

केन्द्र ने सुप्रीम कोर्ट में बताया था कि 1931 में जब आखिरी बार जातिगत जनगणना हुई थी, तब जातियों की कुल संख्या 4,147 थी, लेकिन 2011 में जातियों की संख्या बढ़कर 46 लाख से भी ज्यादा होना पता चला है। हालांकि, यह आंकड़ा सही नहीं हो सकता है। संभव है कि इनमें कुछ जातियां, उपजातियां रही हों। सरकार का कहना था कि जनगणना करने वाले कर्मचारियों की गलती और गणना करने के तरीके में गड़बड़ी के कारण आकंड़े विश्वसनीय नहीं रह जाते हैं।

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