एनसीआई@नई दिल्ली
नई दिल्ली में कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) के विरोध प्रदर्शन के दौरान हुई बड़े पैमाने पर गिरफ्तारियों को लेकर संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार उच्चायुक्त कार्यालय (OHCHR) ने चिंता जताई थी। इसे भारत सरकार और विदेश मंत्रालय (MEA) ने पूरी तरह खारिज करते हुए देश के आंतरिक मामलों में ‘अस्वीकार्य और अनुचित हस्तक्षेप’ करार दिया है।
कॉकरोच प्रदर्शन की पृष्ठभूमि
कॉकरोच जनता पार्टी ने मतदाता सूचियों के ‘विशेष गहन पुनरीक्षण’ (SIR) में कथित गड़बड़ियों का आरोप लगाते हुए मुख्य चुनाव आयुक्त (CEC) ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की मांग को लेकर दिल्ली के जंतर-मंतर पर 10 अक्टूबर 2026 को एक बड़े प्रदर्शन का आह्वान किया था। दिल्ली पुलिस ने कानून-व्यवस्था और सुरक्षा का हवाला देकर इस प्रदर्शन की अनुमति नहीं दी थी। इसके बावजूद प्रदर्शन करने पहुंचे चीफ कॉकरोच के संस्थापक अभिजीत दीपके, सौरव दास, आशुतोष रांका सहित लगभग 7 हजार से अधिक प्रदर्शनकारियों, वकीलों और कुछ पत्रकारों को पुलिस ने हिरासत में ले लिया था।
संयुक्त राष्ट्र (UN) की टिप्पणी और चिंताएं
संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार कार्यालय के प्रवक्ता थामीन अल-खीथान और मानवाधिकार प्रमुख ने इस कार्रवाई पर गम्भीर चिंता व्यक्त करते हुए निम्नलिखित बातें कहीं –
• सामूहिक हिरासत पर चिंता: UN ने दिल्ली में प्रदर्शनकारियों, नागरिक समाज के सदस्यों, वकीलों और पत्रकारों को बड़े पैमाने पर हिरासत में लिए जाने की खबरों पर आपत्ति जताई।
• बिना शर्त रिहाई की मांग: मानवाधिकार संस्था ने कहा कि मनमाने ढंग से हिरासत में लिए गए सभी लोगों को तुरंत और बिना किसी शर्त के रिहा किया जाना चाहिए।
• संयम बरतने की अपील: उन्होंने भारतीय अधिकारियों से कानून लागू करने वाले बलों को शांतिपूर्ण प्रदर्शनकारियों के खिलाफ ‘अत्यधिक संयम’ बरतने की हिदायत देने को कहा।
• आवश्यकता और आनुपातिकता का परीक्षण: UN ने कहा कि शांतिपूर्ण विरोध प्रदर्शनों पर लगाए जाने वाले प्रतिबंध ‘आवश्यकता और आनुपातिकता’ (Necessity and Proportionality) के कड़े मानकों पर आधारित होने चाहिए।
भारत के विदेश मंत्रालय (MEA) का कड़ा जवाब
भारतीय विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता रणधीर जायसवाल और जिनेवा में संयुक्त राष्ट्र के लिए भारत के स्थायी मिशन ने सोशल मीडिया मंच ‘X’ और वीडियो संदेश के जरिए UN को बेहद कड़ा और दो-टूक जवाब दिया।
• आंतरिक मामलों में दखल: भारत ने साफ शब्दों में कहा कि OHCHR की टिप्पणियां पूरी तरह से बेबुनियाद हैं और यह भारत के आंतरिक मामलों में एक अनुचित और अस्वीकार्य हस्तक्षेप है।
• संवैधानिक अधिकारों और कानून का हवाला: विदेश मंत्रालय ने कहा कि भारत दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र है, जहां संविधान नागरिकों को शांतिपूर्ण प्रदर्शन की गारंटी देता है। इसकी रक्षा के लिए देश में स्वतंत्र न्यायपालिका, मजबूत लोकतांत्रिक संस्थाएं और एक आजाद मीडिया मौजूद है।
• सार्वजनिक व्यवस्था सर्वोपरि: भारत ने स्पष्ट किया कि किसी भी अन्य लोकतंत्र की तरह, यहां भी नागरिकों के अधिकार सार्वजनिक व्यवस्था और सुरक्षा बनाए रखने के लिए जरूरी कानूनी प्रतिबंधों के दायरे में आते हैं। देश की कानून प्रवर्तन एजेंसियां (पुलिस) पूरी तरह से कानून के दायरे में रहकर काम करती हैं।
• UN के ‘दोहरे मापदंड’ पर तीखा प्रहार: भारत ने UN मानवाधिकार संस्था के रवैये को ‘बेहद चुनिंदा’ (Extreme Selectivity) करार दिया। विदेश मंत्रालय ने आईना दिखाते हुए कहा कि भारत के पड़ोस (जैसे पाकिस्तान) में प्रदर्शनों पर हिंसक कार्रवाइयां हुईं और खुद UN मुख्यालय के नजदीक (जैसे फ्रांस में) कानून लागू करने वाली एजेंसियों ने कड़े कदम उठाए, तब तो यह संस्था चुप रही।
• क्रेडिबिलिटी का नुकसान: भारत ने तंज कसते हुए कहा कि इस तरह के दोहरे मापदंडों से संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार संस्था की खुद की विश्वसनीयता खत्म होती है और बहुपक्षवाद (Multilateralism) पर से लोगों का भरोसा उठता है।
इस प्रकार भारत सरकार ने पूरी तरह स्पष्ट कर दिया है कि सुरक्षा व्यवस्था को सुचारू रखने के लिए की गई वैधानिक कार्रवाइयों पर वैश्विक संस्थाओं की ऐसी चुनिंदा टिप्पणियां भारत को बिल्कुल भी मंजूर नहीं हैं।
