एनसीआई@चेन्नई
मद्रास हाईकोर्ट ने तमिलनाडु पुलिस को शुक्रवार को एक खास निर्देश जारी किया। इसमें पुलिस से कहा गया है कि वह ऐसे सार्वजनिक विरोध प्रदर्शनों की अनुमति न दे जो वर्तमान जजों को व्यक्तिगत रूप से निशाना बनाने, बदनाम करने या डराने के लिए हों। साथ ही अगर किसी जज को निशाना बनाने के लिए कोई सभा की जा रही हो तो उसे तुरंत रोक दिया जाए। चीफ जस्टिस सुश्रुत अरविंद धर्माधिकारी और जस्टिस जी अरुल मुरुगन की डिवीजन बेंच ने यह फैसला सुनाया।
आदेश में यह है
कोर्ट ने अपने आदेश में कहा है कि ऐसी किसी भी सार्वजनिक सभा या मार्च के लिए अनुमति नहीं दी जाएगी, जो किसी सक्रिय जज को व्यक्तिगत रूप से निशाना बनाने, बदनाम करने या डराने के इरादे से की जा रही है। अगर सभा को अनुमति मिली है और वहां पर निजी हमले होते हैं तो सम्बंधित अधिकारी तुरंत कार्यक्रम को खत्म करेंगे और उचित कानूनी कार्रवाई करेंगे।
फैसले से असहमति का आधिकार है लेकिन…
आदेश में आगे कहा गया कि वैसे तो नागरिकों को न्यायिक निर्णयों की आलोचना करने का अधिकार है, लेकिन जजों के खिलाफ गाली-गलौच, बदनामी या जाति आधारित हमलों वाले अभियान संविधान द्वारा दिए गए अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के दायरे में नहीं आते। फैसले के मुताबिक नागरिकों को किसी फैसले से असहमत होने का निर्विवाद अधिकार है। हालांकि, एक स्पष्ट कानूनी सीमा है। यह किसी कानूनी निष्कर्ष की आलोचना करने और उस फैसले को देने वाले न्यायाधीश पर हमला करने के बीच होती है।
ऑनलाइन भी हो निगरानी
अदालत ने पुलिस को यह भी निर्देश दिया है कि वे डिजिटल स्पेस पर ऑनलाइन कंटेंट की सक्रिय रूप से निगरानी करें। कहीं, ऐसा न हो कि यह सिटिंग जस्टिस को निशाना बनाने वाली आपराधिक धमकी में बदल न जाए। कोर्ट ने कहा कि राज्य पुलिस के साइबर क्राइम विभाग को निर्देश दिया गया है कि वे डिजिटल प्लेटफॉर्म पर सक्रिय निगरानी बनाए रखें। यह सुनिश्चित करें कि ऑनलाइन सामग्री मौजूदा न्यायाधीशों के खिलाफ आपराधिक धमकी में न बदल जाए। किसी भी उल्लंघन के खिलाफ कानून के अनुसार तुरंत कार्रवाई शुरू ।
जनहित याचिका पर फैसला
यह फैसला आर कार्तिकेयन की जनहित याचिका पर आया। उन्होंने यह याचिका मदुरै बेंच के 25 जून के एक फैसले के खिलाफ विरोध प्रदर्शन के बाद दायर की थी। इस फैसले में, जस्टिस जीआर स्वामीनाथन और पीबी बालाजी की बेंच ने तमिलनाडु सरकार के उस आदेश को रद्द कर दिया था, जिससे पिछड़ा वर्ग, अति पिछड़ा वर्ग, डिनोटिफाइड कम्युनिटीज और अनुसूचित जातियों के लोग इस्लाम में धर्मांतरण करने के बाद पिछड़े वर्ग के मुस्लिम माने जाने की अनुमति दी गई ।
