कानून विशेषज्ञ और रवांडा न्यायाधिकरण की पूर्व अध्यक्ष हैं नवी पिल्लई
एनसीआई@सेन्ट्रल डेस्क
भारतीय मूल की दक्षिण-अफ्रीकी नागरिक नवी पिल्लई को नोबेल शांति पुरस्कार मिला है। इनके दादाजी तमिलनाडु के रहने वाले थे। ये कानून विशेषज्ञ और रवांडा के लिए अंतरराष्ट्रीय आपराधिक न्यायाधिकरण की पूर्व अध्यक्ष रह चुकी हैं। यहां गौरतलब है कि अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने इस पुरस्कार पर कई बार अपना हक जताते रहे। विभिन्न युद्धों को बंद कराने का दावा किया। मगर नवी पिल्लई को यह पुरस्कार दिए जाने की घोषणा से उनकी उम्मीद पर तो पानी फिरा ही है, पाकिस्तान को भी निराशा हाथ लगी है, क्योंकि उसने ट्रम्प को इस पुरस्कार के लिए नोमिनेट किया था।
नवी पिल्लई ने कई मामलों को शांति से सुलझाया
नवी पिल्लई दक्षिण अफ्रीका के हाईकोर्ट, रवांडा के अंतरराष्ट्रीय आपराधिक ट्रिब्यूनल, अंतरराष्ट्रीय आपराधिक न्यायालय और संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार उच्चायुक्त के तौर पर रह चुकी हैं। उन्होंने कब्जे वाले फिलस्तीनी क्षेत्रों पर संयुक्त राष्ट्र जांच आयोग की अध्यक्षता भी की। अभी वे म्यांमार पर नरसंहार के आरोपों से जुड़े मामले में अंतरराष्ट्रीय न्यायालय में जज हैं। पिल्लई ने बलात्कार, यौन हिंसा और मानवता के खिलाफ अपराध के संभावित कृत्यों के रूप में मान्यता देने वाले अहम फैसलों और प्रोपेगैंडा के जरिए उकसाने के मामलों में कानूनी कार्रवाई में अहम भूमिका निभाई।

85 वर्षीय नवी पिल्लई को मुश्किल से मुश्किल मामलों को शांति से हल करने के लिए जाना जाता है। उनके इसी काम का ध्यान में रखकर नोबेल समिति ने उन्हें शांति के सर्वोच्च पुरस्कार से सम्मानित किया गया है।
नोबेल समिति ने सर्वोच्च शांति पुरस्कार के लिए नवी पिल्लई के नाम का ऐलान करते हुए कहा कि उनका काम शांतिपूर्ण ढंग से विवादों को सुलझाने, ताकतवर देशों और व्यक्तियों को जवाबदेह ठहराने और पीड़ितों की सुरक्षा में अंतरराष्ट्रीय कानून के महत्व को रेखांकित करता है।
डरबन की झुग्गियों में रहीं, पिता थे बस ड्राइवर
नवी पिल्लई का जन्म 23 सितम्बर, 1941 को दक्षिण अफ्रीका के डरबन में एक प्रवासी तमिल हिन्दू परिवार में हुआ था। उनके पिता नारायणसामी बस ड्राइवर थे और उनकी मां शांतमा नायडू ने उन्हें पारम्परिक मूल्यों के साथ पाला, जिसने उनके जीवन को एक मजबूत आधार दिया। भारत की इस विरासत और पारिवारिक पृष्ठभूमि के साथ पिल्लई रंगभेद के कठोर दौर में भी आगे बढ़ीं और दक्षिण अफ्रीका में वकालत करने वाली भारतीय मूल की पहली महिलाओं में से एक बनकर उभरीं। वह अग्रणी वकील और कानून विशेषज्ञ बनीं।
नवनेथम नवी पिल्लई का संघर्ष भरा जीवन
नवनेथम नवी पिल्लई का जीवन रंगभेद के दौर में दक्षिण अफ्रीका में भारतीय मूल के लोगों के संघर्ष और न्याय के लिए उनकी लम्बी लड़ाई से जुड़ा रहा है। उन्होंने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मानवाधिकारों की रक्षा और कानून के शासन को मजबूत करने के लिए काम किया है। नोबेल समिति के मुताबिक, नवी पिल्लई का काम उन सभी लोगों के लिए उम्मीद और प्रेरणा का स्रोत है, जो दुनिया को अधिक शांतिपूर्ण बनाना चाहते हैं। दुनिया में युद्ध और संघर्ष बढ़ रहे हैं। जजों और अंतरराष्ट्रीय कानून से जुड़ी संस्थाओं को राजनीतिक दबाव का सामना करना पड़ रहा है। ऐसे समय में यह पुरस्कार याद दिलाता है कि हिंसा के बिना विवादों को सुलझाने के लिए अंतरराष्ट्रीय कानून का सम्मान जरूरी है।

नवनेथम नवी पिल्लई को पुरस्कार मिलने की सूचना देने के लिए समिति उनसे सम्पर्क नहीं कर पाई थी। इस साल नोबेल शांति पुरस्कार के लिए कुल 287 उम्मीदवारों के नामांकन मिले थे। इनमें एक चौथाई से कुछ अधिक नाम संस्थाओं के थे। पुरस्कार के लिए नामांकन करने का अधिकार राष्ट्राध्यक्षों, राष्ट्रीय स्तर के राजनेताओं, विश्वविद्यालय के प्रोफेसरों, विदेश नीति संस्थानों के प्रमुखों, पूर्व नोबेल विजेताओं और नोबेल समिति के सदस्यों समेत कुछ चुनिंदा लोगों और संस्थाओं को होता है।
नोबेल शांति पुरस्कार के बारे में जानिए
नोबेल शांति पुरस्कार की शुरुआत 1901 में हुई थी। अब तक यह 112 व्यक्तियों और 28 अलग-अलग संस्थाओं को दिया जा चुका है। रेडक्रॉस को यह सम्मान तीन बार, जबकि संयुक्त राष्ट्र की शरणार्थी एजेंसी को दो बार मिल चुका है। हालांकि, 19 बार ऐसा भी हुआ है, जब यह पुरस्कार नहीं दिया गया। इनमें से ज्यादातर मौके दोनों विश्व युद्धों के दौरान आए। साल 1948 में महात्मा गांधी की हत्या के बाद भी यह पुरस्कार किसी को नहीं दिया गया था। महात्मा गांधी को 12 बार नामांकित किया गया, लेकिन उन्हें कभी नोबेल शांति पुरस्कार नहीं मिला। इस साल पुरस्कार के तहत 1.2 करोड़ स्वीडिश क्रोना की राशि दी जाएगी, जो करीब 12 लाख अमेरिकी डॉलर के बराबर है।
