करणी सेना के संस्थापक लोकेन्द्र सिंह कालवी पंचतत्व में विलीन, देर रात हो गया था निधन
एनसीआई@जयपुर/नागौर
करणी सेना के संस्थापक लोकेन्द्र सिंह कालवी का आज मंगलवार शाम को उनके पैतृक गांव नागौर जिले के कालवी में अंतिम संस्कार कर दिया गया। कालवी को बड़े बेटे भवानी सिंह ने मुखाग्नि दी। अंतिम संस्कार में खाद्य आपूर्ति मंत्री प्रताप सिंह खाचरियावास सहित प्रदेश के प्रमुख नेता, जनप्रतिनिधि और समाज के लोग मौजूद रहे।

इससे पहले बड़ी संख्या में लोग उनके पैतृक गांव पहुंचे थे। कालवी के निधन पर पूर्व मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे, भाजपा प्रदेशाध्यक्ष डॉ सतीश पूनिया सहित कई नेताओं ने शोक व्यक्त किया। उनका सोमवार देर रात जयपुर के एसएमएस हॉस्पिटल में हार्ट अटेक से निधन हो गया था। डॉक्टर्स ने रात करीब 2 बजे इसकी पुष्टि की।
कालवी के अंतिम दर्शन के लिए सुबह राजपूत सभा भवन, जयपुर में उनका पार्थिव शरीर रखा गया। यहां बड़ी संख्या में विभिन्न राजनीतिक पार्टियों के नेताओं और कार्यकर्ताओं के अलावा राजपूत समाज के लोगों ने इन्हें श्रद्धा सुमन अर्पित किए।

उल्लेखनीय है कि कालवी जून 2022 से ब्रेन स्ट्रोक के चलते अस्पताल में भर्ती थे। इलाज के दौरान ही सोमवार देर रात उनका निधन हो गया। पिछले करीब डेढ़ दशक से कालवी अपने समाज के मुद्दों के लेकर काफी मुखर थे। आए दिन उनके भाषण सुर्खियों में रहते थे। वे करणी सेना के संस्थापक भी थे। करीब साढ़े 18 साल पहले उन्होंने करणी सेना के गठन की नींव रखी थी। सबसे ज्यादा सुर्खियां उन्होंने बॉलीवुड मूवी जोधा अकबर और पद्मावत का विरोध करते वक्त बटोरी थीं। पद्मावत के मामले में तो उन्होंने फिल्म के डायरेक्टर संजय लीला भंसाली और एक्ट्रेस दीपिका पादुकोण को धमकी तक दे दी थी।
विख्यात मेयो कॉलेज में हुई थी शिक्षा
लोकेन्द्र सिंह कालवी का जन्म मध्य राजस्थान के नागौर जिले के कालवी गांव में हुआ था। कालवी की पढ़ाई अजमेर में पूर्व राजपरिवारों के पसंदीदा स्कूल मेयो कॉलेज से हुई थी। उनकी हिन्दी और अंग्रेजी दोनों भाषाओं पर अच्छी पकड़ थी। इसके बावजूद वह राजस्थानी में ही बात करना पसंद करते थे। हमेशा राजस्थानी वेशभूषा में ही रहते थे।
राजनीति में नहीं हो सके सफल
इन सबके साथ ही वे बॉस्केटबॉल के अच्छे खिलाड़ी थे। उनके पिता कल्याण सिंह कालवी थे, जो थोड़े-थोड़ वक्त के लिए राज्य और केन्द्र में मंत्री रहे। उनके असमय देहावसान के बाद लोकेन्द्र की राजनीति में एंट्री हुई थी। वे खुद को किसान नेता कहते थे, लेकिन 67 साल के बाद भी उन्हें राजनीति में वो सफलता नहीं मिल पाई, जिसे वो पाना चाहते थे। हर बार वे कोशिश करते और असफल हो जाते। वर्ष 1993 में भी उन्होंने नागौर से निर्दलीय उम्मीदवार के तौर पर चुनाव लड़ा था, लेकिन हार गए थे। इसके बाद 1998 के लोक सभा चुनावों में उन्होंने बाड़मेर-जैसलमेर सीट से भाजपा के टिकट पर भाग्य आजमाया, लेकिन फिर शिकस्त का सामना किया। उस वक्त वह जाति की राजनीति नहीं कर रहे थे। राजपूत समाज में उनकी अच्छी स्वीकार्यता रही।
