सुप्रीम कोर्ट ने फटकार लगाते हुए खारिज की राष्ट्रपति से नई संसद के उद्घाटन की मांग वाली याचिका, कहा-हमें मालूम क्यों दाखिल की गई, आप पर जुर्माना क्यों न लगाएं?
एनसीआई@नई दिल्ली
संसद भवन की नई इमारत के उद्घाटन को लेकर जारी विवाद से सम्बन्धित जनहित याचिका सुप्रीम कोर्ट ने खारिज कर दी है। सुप्रीम कोर्ट ने याचिका पर सुनवाई से ही इनकार कर दिया। याचिका खारिज करते हुए कोर्ट ने कहा कि हम जानते हैं कि यह याचिका क्यों दाखिल हुई। ऐसी याचिकाओं को देखना सुप्रीम कोर्ट का काम नहीं है। कोर्ट ने पूछा कि इस याचिका से किसका हित प्रभावित हो रहा है? इस पर याचिकाकर्ता सटीक जवाब नहीं दे पाए।
याचिका में शीर्ष अदालत से नए भवन का उद्घाटन राष्ट्रपति से कराने का निर्देश लोकसभा सचिवालय को देने की मांग की गई थी। याचिका में कहा गया था कि लोकसभा सचिवालय का बयान और लोकसभा के महासचिव का उद्घाटन समारोह के लिए जारी निमंत्रण भारतीय संविधान का उल्लंघन है।कोर्ट ने कहा है कि इस तरह का आदेश देना उसका काम नहीं। सुनवाई के दौरान जजों ने यह भी कहा कि इस मामले में याचिकाकर्ता का कोई अधिकार प्रभावित नहीं हो रहा है।
तमिलनाडु के रहने वाले वकील सीआर जयासुकिन ने प्रधानमंत्री के हाथों नए संसद भवन का उद्घाटन करवाए जाने का विरोध करते हुए यह याचिका दाखिल की थी।लोकसभा सचिवालय की तरफ से इस कार्यक्रम के सम्बन्ध में जारी निमंत्रण पत्र को असंवैधानिक बताते हुए उन्होंने दलील दी थी कि राष्ट्रपति देश के संवैधानिक प्रमुख हैं, इसलिए नए संसद भवन का उद्घाटन उन्हीं से करवाया जाना चाहिए।
‘हर्जाना लगाते हुए खारिज क्यों नहीं करना चाहिए याचिका?’
सुप्रीम कोर्ट की अवकाशकालीन बेंच के जस्टिस जेके माहेश्वरी और पीएस नरसिम्हा की बेंच के सामने यह मामला लगा। जजों ने शुरू में ही पूछा कि इस तरह की याचिका को हर्जाना लगाते हुए खारिज क्यों नहीं करना चाहिए? इस पर वकील ने अपनी बात रखने की अनुमति मांगी। जजों ने उनसे कहा कि आप अपनी बात रखिए।
याचिकाकर्ता ने कहा कि राष्ट्रपति देश के संवैधानिक प्रमुख हैं। संविधान के अनुच्छेद 79 में संसद का जो गठन बताया गया है, उसके तीन हिस्से हैं – राष्ट्रपति, लोकसभा और राज्यसभा। इस तरह राष्ट्रपति संसद का एक हिस्सा है, जबकि प्रधानमंत्री सिर्फ संसद के सदस्य हैं। इस पर जस्टिस नरसिम्हा ने कहा, “अनुच्छेद 79 सिर्फ एक व्यवस्था की व्याख्या करता है, इसमें कहीं भी इस बात की अनिवार्यता नहीं दी गई है कि कोई उद्घाटन भी राष्ट्रपति के हाथों ही करवाना जरूरी है। ”
‘याचिका अनुच्छेद 32 के तहत कैसे दाखिल की गई’
जस्टिस जेके माहेश्वरी ने इस बात पर आश्चर्य जताया कि इस तरह की याचिका अनुच्छेद 32 के तहत कैसे दाखिल की गई है? मामले में याचिकाकर्ता या किसी भी व्यक्ति का कौन सा अधिकार प्रभावित हो रहा है? वकील ने एक बार फिर कहा कि अनुच्छेद 85 के तहत राष्ट्रपति ही संसद का सत्र बुलाते हैं और 87 के तहत वह दोनों सदनों को सम्बोधित करते हैं।
आखिरकार जजों ने कहा, “हमने याचिकाकर्ता को काफी देर तक अपनी बात रखने की अनुमति दी, वह यह साबित नहीं कर पा रहा है कि मामले में सुप्रीम कोर्ट को क्यों दखल देना चाहिए? संविधान के जिन अनुच्छेदों का उल्लेख उन्होंने किया, उनसे कहीं भी यह साबित नहीं होता कि किसी इमारत का उद्घाटन राष्ट्रपति को ही करना चाहिए।”
इसके बाद जजों ने याचिका खारिज करने का आदेश लिखवाना शुरू किया। तब याचिकाकर्ता ने अनुरोध किया कि उन्हें याचिका वापस लेने की अनुमति दी जाए। कोर्ट में मौजूद सॉलिसीटर जनरल तुषार मेहता ने इसका विरोध किया। उन्होंने कहा कि अगर याचिका वापस लेने की अनुमति दी गई तो याचिकाकर्ता इसे हाईकोर्ट में दाखिल कर देगा। इस पर जजों ने याचिकाकर्ता से पूछा कि क्या वह हाईकोर्ट में याचिका दाखिल करना चाहता है। इस पर उसके वकील ने इससे मना किया। इसके बाद कोर्ट ने उसे याचिका वापस लेने की अनुमति दे दी।
