मुख्यमंत्री बनने के लिए वसुंधरा राजे की प्रेशर पॉलिटिक्स खुलकर शुरू, आवास पर पहुंचे 24 से अधिक विधायक
एनसीआई@जयपुर
राजस्थान विधानसभा चुनाव के नतीजे आने के बाद से ही मुख्यमंत्री के नाम को लेकर एक ओर जहां अटकलबाजियां शुरू हुईं तो वसुंधरा राजे के चिरपरिचित बगावती तेवर और भी जोर पकड़ गए। इसी सिलसिले को आगे बढ़ाते हुए आज सोमवार को वसुंधरा राजे के निवास पर उनके करीबी विधायकों का जमघट लगा। यहां बीजेपी के 24 से अधिक विधायक पहुंचे। बड़ी बात यह रही कि इनमें से कुछ विधायक मीडिया के कैमरों के सामने आए और वसुंधरा राजे को मुख्यमंत्री बनाए जाने की वकालत की। किसी ने खुलकर तो किसी ने गोलमोल तरीके से। दिन भर यह क्रम चला तो बाद में डिनर का भी आयोजन किया गया।
इससे पहले कल रविवार को विधानसभा चुनाव परिणाम आने के बाद पांच साल तक मीडिया से तकरीबन दूर रहीं वसुंधरा राजे ने अपने निवास पर ही पत्रकारों से बातचीत की और जीत पर प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी और गृहमंत्री अमित शाह की तारीफों के कसीदे पढ़ डाले। मतदान परिणाम आने के पहले से भी उन्होंने बागी भाजपा प्रत्याशियों से सम्पर्क साधना शुरू कर दिया था। इस पूरे घटनाक्रम पर दो दृष्टिकोण सामने आए। पहला खेमेबाजी और दूसरा हाईकमान से ग्रीन सिग्नल मिलने के बाद की कवायद। मगर जानकारों ने इनमें से पहले दृष्टिकोण को अधिक सही माना।
आज जो घटनाक्रम सामने आया, उससे तो यह और पक्का माना जा रहा है कि वसुंधरा राजे मुख्यमंत्री बनने के लिए खुलकर प्रेशर पॉलिटिक्स को अपना चुकी हैं। वहीं, दूसरी ओर जिन अन्य वरिष्ठ नेताओं को मुख्यमंत्री के उम्मीदवारों की सूची में शामिल माना जा रहा है, वह अपना नाम लाइम लाइट में आने देना ही नहीं चाह रहे हैं। वे इससे पूरी तरह बचने की कोशिश कर रहे हैं। इसके विपरीत वसुंधरा राजे का रवैया पार्टी की रीति नीति के बिलकुल विरुद्ध दिख रहा है। केन्द्रीय नेतृत्व के ग्रीन सिग्नल के बिना अपने घर पर विधायकों को परेड कराना बड़े हौंसले की बात है। ऐसे हौंसले के लिए वैसे वसुंधरा पहले से भी जानी जाती हैं। एक बार तो वह अलग ही पार्टी बनाने की कवायद तक कर चुकी हैं।
इस घटनाक्रम से अलग मुख्यमंत्री की रेस में शुरू से ही प्रमुख चेहरा माने जा रहे तिजारा से विधायक बने, अलवर से सांसद संत बालकनाथ दिल्ली पहुंच गए। केन्द्रीय मंत्री गजेन्द्र सिंह शेखावत भी इसमें शामिल रहे। हालांकि ये आज से प्रारम्भ हुए संसद के शीतकालीन सत्र में शामिल हुए।
वसुंधरा का ऐसा रहा शक्ति प्रदर्शन
बीजेपी के नवनिर्वाचित जहाजपुर विधायक गोपीचंद मीणा ने वसुंधरा राजे से मुलाकात करने के साथ कहा कि लोग वसुंधरा राजे को मुख्यमंत्री के रूप में देखना चाहते हैं। ब्यावर विधायक सुरेश रावत भी वसुंधरा राजे से मिलने पहुंचने वालों में शामिल रहे। उन्होंने कहा कि वसुंधरा ने पहले बहुत अच्छा काम किया है। हालांकि उनके पक्ष में खुलकर बोलने से बचते हुए उन्होंने बात को घुमाया और कहा कि, लेकिन आलाकमान जिसे सीएम बनाए, हम पार्टी के साथ हैं। वहीं विधायक बहादुर सिंह कोली वसुंधरा राजे के घर में घुसते हुए बोले बोले- वसुंधरा राजे को ही सीएम बनना चाहिए। यह अलग बात है कि उन्होंने भी कहा कि वह पार्टी के फैसले के साथ हैं।
अब यहां समझने वाली बात यह है कि ऐसी गोलमोल बातें करने वाले नेता पार्टी के फैसले के समर्थन की बात तभी तक करते हैं, जब तक क्ष उनकी मंशा पूरी होती लगती है। ऐसा नहीं होने पर वह कोई भी राह पकड़ सकते हैं।
वसुंधरा के पास क्या हैं ऑप्शन ?
अगर वसुंधरा पार्टी पर प्रेशर बनाने के लेवल तक खुद को ले जाती हैं तो इसका अंजाम उनके पक्ष में जाएगा, इसकी उम्मीद नहीं है। वर्तमान में राजस्थान की राजनीति में कांग्रेस भी इतनी ताकतवर नहीं है कि उसका सपोर्ट उन्हें मिल सके। यह सही है कि जिन विधायकों ने उनके घर पहुंचने की हिम्मत दिखाई है, वास्तव में वे वसुंधरा के कट्टर समर्थक होंगे। हो सकता है कि एक दो विधायक और उनके पास हों। पर कांग्रेस के 69 विधायक मिलकर भी उनका भला नहीं कर सकते। भारतीय जनता पार्टी की जो कार्यशैली है उससे तो यही लगता है कि कांग्रेस पार्टी के उन 69 विधायकों का भी भरोसा नहीं है कि वो कब तक अपनी पार्टी का दामन थामे रहेंगे। वसुंधरा के समर्थन की बात तो दूर की कोड़ी हो जाएगी।
लोकसभा चुनाव के कारण वसुंधरा के लिए उम्मीद
इसमें कोई दो राय नहीं हो सकती है कि वसुंधरा के पास राजस्थान में आज भी काफी जनसमर्थन है। उनकी रैलियों में जनता की भीड़ यह बताती थी कि राजस्थान के लोकल नेताओं में सबसे अधिक वो लोकप्रिय हैं. राजपूत की बेटी, जाटों की बहू और गुर्जरों की समधन की छवि के चलते उनकी पैठ हर वर्ग में रही है। यही कारण रहा कि बीजेपी आलाकमान ने उनको कमान तो नहीं दी पर उन्हें अलग-थलग भी नहीं होने दिया। हालांकि वसुंधरा इस बार के चुनावों में अपने होम डिस्ट्रिक्ट में ही कुछ नहीं कर पाईं। धौलपुर जिले की चारों सीटों में से एक भी बीजेपी नहीं जीत सकी है। इसी तरह अभी वसुंधरा के कई खास लोग अपना चुनाव नहीं जीत सके। फिर भी अगर वसुंधरा प्रेशर बनाती हैं तो हो सकता है कि 2024 में होने वाले लोकसभा चुनावों तक पार्टी उन्हें राजस्थान की कमान सौंप दे, क्योंकि भारतीय जनता पार्टी का फोकस अभी पूरी तरह 2024 के लोकसभा चुनाव हैं। पार्टी नहीं चाहेगी कि जिस तरह अशोक गहलोत और सचिन पायलट की लड़ाई में राजस्थान में कांग्रेस का बंटाधार हो गया, उसी तरह वसुंधरा राजे के चलते बीजेपी भी कमजोर हो।
