April 20, 2026

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श्रीकृष्ण जन्मभूमि-शाही ईदगाह सर्वे पर सुप्रीम कोर्ट की रोक: कहा- हिन्दू पक्ष की मांग स्पष्ट नहीं, हाईकोर्ट ने कमिश्नर सर्वे का दिया था आदेश

श्रीकृष्ण जन्मभूमि-शाही ईदगाह सर्वे पर सुप्रीम कोर्ट की रोक: कहा- हिन्दू पक्ष की मांग स्पष्ट नहीं, हाईकोर्ट ने कमिश्नर सर्वे का दिया था आदेश

एनसीआई@नई दिल्ली

मथुरा की श्रीकृष्ण जन्मभूमि-शाही ईदगाह परिसर के सर्वे के इलाहाबाद हाईकोर्ट के आदेश पर सुप्रीम कोर्ट ने रोक लगा दी है। मंगलवार को मुस्लिम पक्ष की याचिका पर सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने यह निर्णय लिया। कोर्ट ने हिन्दू पक्ष की ओर से हाईकोर्ट में दाखिल अस्पष्ट आवेदन पर भी सवाल उठाए हैं। कोर्ट ने हिन्दू पक्ष से कहा कि सर्वे कमिश्नर की नियुक्ति के लिए एक अस्पष्ट आवेदन दायर नहीं कर सकते हैं। इसका मकसद स्पष्ट होना चाहिए।

सुप्रीम कोर्ट ने मुस्लिम पक्ष की याचिका पर इस केस से जुड़े हुए हिन्दू संगठन, भगवान श्रीकृष्ण विराजमान और अन्य से जवाब मांगा है। इस केस पर अगली सुनवाई 23 जनवरी को होगी। इसके साथ ही सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि सर्वे केस के अलावा ईदगाह से जुड़े अन्य सभी केस पर इलाहाबाद हाईकोर्ट में सुनवाई चलती रहेगी।

इससे पहले 14 दिसम्बर को इलाहाबाद हाईकोर्ट ने हिन्दू पक्ष की याचिका स्वीकार करते हुए परिसर का सर्वे कराने के लिए कोर्ट कमिश्नर नियुक्त करने का आदेश दिया था। हाईकोर्ट ने मुस्लिम पक्ष यानी वक्फ बोर्ड की उन दलीलों को खारिज कर दिया था, जिसमें उन्होंने याचिका को सुनने योग्य नहीं होने का दावा किया था।

लाइव लॉ के मुताबिक, वकील तहसीम अहमदी मुस्लिम पक्ष की तरफ से कोर्ट में पेश हुए। उन्होंने तर्क दिया कि हाईकोर्ट को उस याचिका पर आदेश जारी नहीं करना चाहिए, जो कि 1991 वरशिप एक्ट के तहत विचाराधीन है। वहीं, वादी वकील श्याम दीवान ने सुप्रीम कोर्ट के सर्वे पर रोक लगाने के आदेश के खिलाफ आपत्ति की। हालांकि, सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि हाईकोर्ट के इस आदेश के खिलाफ कुछ कानूनी पहलू हैं। इसके बाद कोर्ट ने आदेश पर रोक लगा दी।

हिन्दू पक्ष ने कहा- सर्वे होगा तो सच सामने आ जाएगा

सुप्रीम कोर्ट के फैसले पर वादी और श्रीकृष्ण जन्मभूमि मुक्ति निर्माण संघर्ष न्यास के अध्यक्ष दिनेश शर्मा ने कहा- अगर सर्वे होगा तो सब सच सामने आ जाएगा। शर्मा ने कहा, ”हिन्दू पक्ष के पास प्राचीन सबूत हैं। खसरा खतौनी में नाम हिन्दू पक्ष का है। बिजली और पानी का बिल हिन्दू पक्ष देता है। नगर निगम का टेक्स भी हिन्दू पक्ष देता है, इसलिए एक न एक दिन सर्वे अवश्य होगा। क्योंकि, कोर्ट सबूत के आधार पर फैसला देती है। हालांकि, मुस्लिम पक्ष कुछ दिन के लिए सर्वे को रोकने में सफल हो गया है। मुस्लिम पक्ष तो यही चाहता है कि सर्वे को कुछ दिन के लिए रुकवाया जाए, क्योंकि उन्हें पता है कि जब सर्वे हो जाएगा, तो दूध का दूध पानी का पानी हो जाएगा।”

हिन्दू पक्षकारों ने समझौते को बताया अवैध

श्रीकृष्ण जन्मस्थान शाही ईदगाह मामले में 12 अक्टूबर 1968 को एक समझौता हुआ था। श्रीकृष्ण जन्मस्थान ट्रस्ट के सहयोगी संगठन श्रीकृष्ण जन्मभूमि सेवा संघ और शाही ईदगाह के बीच हुए इस समझौते में 13.37 एकड़ भूमि में से करीब 2.37 एकड़ भूमि शाही ईदगाह के लिए दी गई थी। हालांकि, इस समझौते के बाद श्रीकृष्ण जन्मभूमि सेवा संघ को भंग कर दिया गया। इस समझौते को हिन्दू पक्ष अवैध बता रहा है। हिन्दू पक्ष के मुताबिक, श्रीकृष्ण जन्मभूमि सेवा संघ को समझौते का अधिकार था ही नहीं।

यह था 1968 में हुआ समझौता

1946 में जुगल किशोर बिड़ला ने जमीन की देखरेख के लिए श्रीकृष्ण जन्मभूमि ट्रस्ट बनाया था। साल 1967 में जुगल किशोर की मौत हो गई थी। कोर्ट के रिकॉर्ड के मुताबिक, 1968 से पहले परिसर बहुत विकसित नहीं था। साथ ही 13.37 एकड़ भूमि पर कई लोग बसे हुए थे।

1968 में ट्रस्ट ने मुस्लिम पक्ष से एक समझौता कर लिया। इसके तहत शाही ईदगाह मस्जिद का पूरा मैनेजमेंट मुस्लिमों को सौंप दिया गया। 1968 में हुए समझौते के बाद परिसर में रह रहे मुस्लिमों को इसे खाली करने को कहा गया। इसके साथ ही मस्जिद और मंदिर को एक साथ संचालित करने के लिए बीच में दीवार बना दी गई।

समझौते में यह भी तय हुआ कि मस्जिद में मंदिर की ओर कोई खिड़की, दरवाजा या खुला नाला नहीं होगा। यानी यहां उपासना के दो स्थल एक दीवार से अलग होते हैं। याचिकाकर्ताओं का तर्क है कि 1968 का यह समझौता धोखाधड़ी से किया गया था और कानूनी रूप से वैध नहीं है।

उनका कहना है कि किसी भी मामले में देवता के अधिकारों को समझौते से खत्म नहीं किया जा सकता है, क्योंकि देवता कार्यवाही का हिस्सा नहीं थे।

विवादित भूमि पर है किसका अधिकार?

शाही ईदगाह मस्जिद का निर्माण 1670 में औरंगजेब ने कराया था। माना जाता है कि इस मस्जिद का निर्माण एक पुराने मंदिर की जगह कराया गया था। इस इलाके को नजूल भूमि यानी गैर-कृषि भूमि माना जाता है। इस पर पहले मराठों और बाद में अंग्रेजों का आधिपत्य था।

1815 में बनारस के राजा पटनी मल ने 13.37 एकड़ की यह भूमि ईस्ट इंडिया कम्पनी से एक नीलामी में खरीदी थी, जिस पर ईदगाह मस्जिद बनी है और जिसे भगवान कृष्ण का जन्म स्थान माना जाता है।

राजा पटनी मल ने ये भूमि जुगल किशोर बिड़ला को बेच दी थी और ये पंडित मदन मोहन मालवीय, गोस्वामी गणेश दत्त और भीकेन लालजी आत्रेय के नाम पर रजिस्टर्ड हुई थी। जुगल किशोर ने श्रीकृष्ण जन्म भूमि ट्रस्ट नाम से एक ट्रस्ट बनाया, जिसने कटरा केशव देव मंदिर के स्वामित्व का अधिकार हासिल कर लिया।

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