April 20, 2026

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सलमान खान आरएसएस के कार्यक्रम में शामिल हुए, भागवत बोले- संघ सभी धर्मों का सम्मान करता है, हमें पावर की इच्छा नहीं

सलमान खान आरएसएस के कार्यक्रम में शामिल हुए, भागवत बोले- संघ सभी धर्मों का सम्मान करता है, हमें पावर की इच्छा नहीं

एनसीआई@मुम्बई

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) के 100 साल पूरे होने पर मुम्बई में शनिवार को आयोजित हुए कार्यक्रम में बॉलीवुड अभिनेता सलमान खान भी शामिल हुए। वे फिल्ममेकर सुभाष घई और गीतकार प्रसून जोशी के साथ मंच के सामने बैठे और आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत का भाषण ध्यान से सुना।

इस कार्यक्रम में संघ प्रमुख मोहन भागवत ने कहा कि भारत में रहने वाला हर कोई हिन्दू है। यह शब्द किसी खास रस्म या प्रार्थना से जुड़े धर्म को नहीं दिखाता है, न ही यह किसी खास समुदाय का नाम है। उन्होंने कहा- आरएसएस किसी के खिलाफ नहीं है और न ही इसे सत्ता या पावर की इच्छा है। संघ राजनीति में सीधे तौर पर शामिल नहीं है, हालांकि संघ के कुछ लोग राजनीति में सक्रिय हैं। भागतव ने कहा-बहुत से लोग मानते हैं कि नरेन्द्र मोदी आरएसएस की वजह से प्रधानमंत्री हैं। मोदी एक पॉलिटिकल पार्टी चलाते हैं और आरएसएस के कई वॉलंटियर पब्लिक लाइफ में एक्टिव हैं, लेकिन पॉलिटिकल पार्टी एक अलग एंटिटी है, आरएसएस का कोई हिस्सा नहीं है।

भागवत ने कहा- भारत का बंटवारा धर्म की वजह से हुआ। हमने कहा कि हम सभी धर्मों का सम्मान करते हैं, क्योंकि हम हिन्दू हैं। इस्लाम, ईसाई धर्म अभी भी भारत में मौजूद हैं। झड़पें होती हैं, लेकिन देश एकजुट रहा है। हिन्दू भाव को भुला देना भी बंटवारे का कारण बना।

भागवत की स्पीच की 6 बड़ी बातें:-

संघ देश में चल रहे सकारात्मक प्रयासों को समर्थन और मजबूती देने पर फोकस करता है। संघ कोई पैरामिलिट्री फोर्स नहीं है। रूट मार्च और स्वयंसेवकों के लाठी अभ्यास के बावजूद आरएसएस को अखाड़ा या सैन्य संगठन के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए।

हिन्दुत्व अपनाने से किसी को कुछ भी छोड़ना नहीं पड़ता। न आपकी पूजा-पद्धति बदलती है, न भाषा, न रहन-सहन। हिन्दुत्व का मतलब है सुरक्षा और साथ-साथ रहने का भरोसा। यह किसी एक धर्म को थोपने की बात नहीं करता। लोगों की आस्था, खाने-पीने की आदतें और भाषा अलग हो सकती हैं, लेकिन हम सब एक ही समाज, संस्कृति और देश का हिस्सा हैं। इसी सोच को हिन्दुत्व कहा जाता है, आप इसे भारतीयता कह सकते हैं। इसलिए हिन्दू-मुस्लिम एकता कहावत सही नहीं है, क्योंकि हम पहले से ही एक हैं।

1925 में आरएसएस बनने से पहले अंग्रेजों ने इंडियन नेशनल कांग्रेस (INC) को अपने सेफ्टी वाल्व के रूप में (सुरक्षा) बनाया था। लेकिन बाद में भारतीयों ने उसी कांग्रेस को आजादी की लड़ाई का मजबूत हथियार बना दिया।

देश में अपना उत्पादन (स्वदेशी) मजबूत होना चाहिए, लेकिन दुनिया से जुड़ाव भी जरूरी है। साथ ही उन्होंने यह भी साफ किया कि यह जुड़ाव टेक्स या टेरिफ लगाकर जबरदस्ती नहीं होना चाहिए। परिवारों में बातचीत जरूरी है, ताकि यह पक्का हो सके कि नई पीढ़ी ड्रग्स न ले या सुसाइड न करे। नागरिकों को सोचना चाहिए कि वे देश की सेवा के लिए कितना समय दे सकते हैं। सही और शांति से साथ रहने की ताकत को एक्टिवेट करने की जरूरत है, हमें एक-दूसरे का साथ देना होगा।

भागवत ने समाज सुधारकों और हेडगेवार का जिक्र किया

संघ प्रमुख ने आजादी के समय बनी अलग-अलग विचारधाराओं का जिक्र करते हुए राजा राम मोहन रॉय, स्वामी विवेकानंद और दयानंद सरस्वती जैसे समाज सुधारकों को याद किया। उन्होंने कहा कि इन लोगों की सोच ने देश के समाज को जागरूक बनाने में बड़ी भूमिका निभाई। समाज को दिशा देने और जरूरी माहौल बनाने का काम बड़े स्तर पर नहीं हो पा रहा है। इसी कमी को भरने के लिए संघ लगातार काम करता है।

आरएसएस के संस्थापक डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार ने 13 साल की उम्र में माता-पिता को खो दिया था। इसके बावजूद हेडगेवार ने आजादी की लड़ाई में बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया। मेडिकल की पढ़ाई के दौरान वे क्रांतिकारी लोगों के संपर्क में आए और ‘कोकेन’ कोड नाम से गुप्त रूप से काम किया। इस किस्से का जिक्र रास बिहारी बोस की किताब में भी मिलता है।

‘सृष्टि का संचालन धर्म के आधार पर होता है’

अनुशासन पर जोर देते हुए भागवत ने कहा कि अगर कोई अकेले रहना चाहता है तो अनुशासन की जरूरत नहीं, लेकिन समाज के साथ चलना है तो नियम और अनुशासन जरूरी होते हैं। उन्होंने कहा कि सृष्टि का संचालन भी धर्म के आधार पर ही होता आया है। उनका कहना था कि भारत को विश्व गुरु बनना है, लेकिन यह केवल भाषणों से नहीं बल्कि आचरण और उदाहरण से सम्भव होगा। जो भारतीय हैं, उनके भीतर यह क्षमता विरासत के रूप में मौजूद है।

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