April 22, 2026

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जेएलएफ: गुलजार ने लता मंगेशकर के बारे में कहीं बड़ी बातें, वक्ताओं ने हिंदी की स्थिति पर चौंकाने वाले दावे भी किए

जेएलएफ: गुलजार ने लता मंगेशकर के बारे में कहीं बड़ी बातें, वक्ताओं ने हिंदी की स्थिति पर चौंकाने वाले दावे भी किए

एनसीआई@जयपुर

जयपुर लिटरेचर फेस्टिवल (जेएलएफ) के तीसरे दिन शनिवार को गीतकार गुलजार ने लता मंगेशकर की जमकर तारीफ की। उन्होंने कहा- मेरी आवाज ही पहचान है, लता मंगेशकर का ऑटोग्राफ बन गया था। साथ ही कहा- बतौर प्रोड्यूसर लताजी बेहद खराब थीं। पैसे की हिफाजत नहीं करती थीं। एक अच्छा प्रोड्यूसर कंजूस होता है। गुलजार ने बॉलीवुड के नाम पर भी ऐतराज जताया। उन्होंने कहा- बॉलीवुड नाम अच्छा नहीं है। उधार लिया हुआ और ओढ़ा हुआ लगता है।

जेएलएफ में यतीन्द्र मिश्र की किताब ‘लता सुरगाथा’ के इंग्लिश वर्जन के इनोग्रेशन पर प्रसिद्ध गीतकार गुलजार ने कहा- मैंने लताजी के लिए ‘मेरी आवाज ही पहचान है’ गाना लिखा था। यह मैंने उनके ऑटोग्राफ देने के ​स्टाइल के लिए लिखा था। ताकि वे जब भी कहीं ऑटोग्राफ दे, तो वे लिखे कि मेरी आवाज ही पहचान है। आज ये गाना उनका ऑटोग्राफ ही बन गया है। गुलजार ने कहा- हमारी इंडस्ट्री में गाने वाले तो बहुत आए। लता जी जैसा न कोई था। न कोई होगा। उनकी आवाज के अलावा भी पहचान थी।

लताजी हर आदमी के जीवन का हिस्सा

गुलजार ने कहा- लता जी हर आदमी की रोज के जीवन का हिस्सा बन गई थी। यह लोगों को भी नहीं पता था। सुबह पूजा के समय लता जी का गाना बजता है। शादी की रस्मों में भी उनका गाना सुनाई देता है। सही मायने में शादियां लता जी के गानों के बिना अूधरी लगती हैं। होली आई तो उनका गीत, रक्षाबंधन पर बहन उनके गीत के साथ भाईयों के कलाई पर राखी बंधती है। लता जी हर त्योहार का हिस्सा है। ऐसा उनके अलावा कोई और नहीं कर पाया। हालांकि बतौर प्रोड्यूसल लताजी बेहद खराब थीं। पैसे की हिफाजत नहीं करती थी। एक अच्छा प्रोड्यूसर कंजूस होता है।

प्लेबैक सिंगर अवॉर्ड लता जी की देन

इस दौरान यतीन्द्र मिश्र ने कहा- आज फिल्मफेयर में जो बेस्ट प्लेबैक सिंगर का अवॉर्ड मिलता है, वह लताजी की ही देन है। एक बार ​म्युजिक डायरेक्टर को बेस्ट म्युजिक डायरेक्टर का अवॉर्ड मिला था। वह गाना लता जी ने गाया था। कार्यक्रम के लिए लता जी को गाने के लिए बुलाया गया। उन्होंने यह कहते हुए म्युजिक डायरेक्टर को मना कर दिया कि आपको अवॉर्ड मिला है, आपको वहां अपना म्युजिक सुनाना चाहिए। इसके कुछ साल बाद पहली बार लता जी को बेस्ट प्लेबैक सिंगर का अवॉर्ड मिला। इसके बाद आज तक परम्परा जारी है। श्रेया घोसाल, अरिजीत को लताजी का अहसान मानना चाहिए। उनके चलते आज वे भी यह अवॉर्ड ले पा रहे हैं।

गुलजार ने बताया- एक बार मैंने एक गाना लिखा आपसे खूबसूरत आपके अंदाज हैं। आपकी बदमाशियों के ये नए अंदाज है। इसके बदमाशियों शब्द पर म्युजिक डायरेक्टर पंचम दा ने आपत्ति जताते हुए कहा कि यह शब्द दीदी को पसंद नहीं आएगा। आप इसे बदल दीजिए। मैंने उन्हें समझाया कि यह वल्गर शब्द नहीं है। हमारे बोलचाल का ही शब्द है। वे नहीं माने, मैंने उन्हें कहा कि मैं इसका ऑप्शन दे दूंगा। आप बस लता जी को यह सुना ​दीजिए या बता ​दीजिए। जब लताजी रिकॉर्डिंग्स के लिए आई तो पंचम दा मेरी तरफ बार-बार देख रहे थे। तब दीदी ने पूछा कि क्या हुआ कोई दिक्कत है क्या। पंचम दा कुछ बोले ही नहीं। तब मैंने कहा- वे इसलिए परेशान हैं कि गाने में एक शब्द बदमाशियां है। वह आपको पसंद नहीं आएगा, उसे हटाना पड़ेगा। तब लता जी ने कहा- इस गाने की लाइनों में यह शब्द ही तो नया है। ऐसे नए शब्द ही तो मुझे गाने को नहीं मिलते।

गुलजार ने कहा- यतीन्द्र की सबसे खूबसूरत बात वह ईमानदार और डिवोशनल है। उनकी इस बुक में ईमानदारी और डिवोशनल अंदाज देखा जा सकता है। यतीन्द्र ने कहा कि मैं लता मंगेशकरजी की खासियत को अपने हवाले से दुनिया के सामने लाना चाह रहा था। लता मंगेशकर आजाद भारत की सबसे बड़ी सांस्कृतिक पहचान है।

चाइना से आया कोरोना

जेएलएफ के प्रोटेक्ट टू नेशन सेशन में आईएएस अधिकारी सज्जन सिंह यादव और लेखिका प्रियम गांधी मोदी ने दावा किया कि कोरोना वायरस चीन के वुहान से ही निकला है। सज्जन सिंह ने कहा- वुहान में ही सबसे बड़ी रिसर्च लैब है। वहीं से यह वायरस निकला है, हालांकि डब्ल्यूएचओ ने इसकी अब तक पुष्टि नहीं की है। जबकि यूएस और ब्रिटेन की रिपोर्ट्स में भी वुहान का जिक्र किया है। यहां तक कि कोरोना के शुरुआती दिनों में वुहान की लैब काम करने वाले साइंटिस्ट हॉस्पिटल में एडमिट थे।

प्रियम गांधी मोदी ने बताया कि दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र और दूसरे सबसे अधिक आबादी वाले देश भारत के सामने एक बड़ी चुनौती थी। जब कोविड महामारी ने दस्तक दी। देश के भीतर विशाल आकार और जटिलताओं ने इस बीमारी से लड़ना काफी कठिन बना दिया है। शुरुआती महीनों में कोई दवा, कोई टीका उपलब्ध नहीं था। उस समय हमारा हेल्थ केयर सिस्टम मजबूत नहीं था।हालांकि तब तक कई देशों में इसका तेजी से असर हो गया था। इसके चलते इंडिया में रिसर्च और इस बीमारी की गम्भीरता पर काम शुरू हो गया। हमने कुछ ही महीनों में न केवल वैक्सीन, बल्कि हर वो चीज हासिल की, जिसकी इस पेंडेमिक के लिए जरूरी थी। हम सीखते-सीखते आगे बढ़े, उस समय देश में पॉलिटिकल रैलियां, धार्मिक आयोजन सहित कई तरह के बड़े इवेंट्स थे। सबसे पहले भीड़ वाले इवेंट्स पर रोक लगाई गई। यह एक बड़ा कदम था। इसके बाद लोगों तक अवेयरनेस फैलाना अलग कदम था। यह सबसे कठिन था।

प्रियम ने कहा कि यह सही है कि लॉकडाउन के बाद माइग्रेंट वर्कर्स पर इसका बड़ा फर्क पड़ा। दो हफ्त तक तो लोगों को कुछ समझ ही नहीं आया। फिर लोग अपने घरों के लिए निकले। हमने इस कोविड में बहुत कुछ खोया है, लेकिन हमने इससे सीखा भी बहुत है। आज देश में सरकार फ्यूचर हेल्थ इमरजेंसी पर काम हो रहा है। यह एक बड़ा बदलाव है। जिस तरफ हम बढ़ रहे है। डॉक्टर नरेश त्रेहान ने कहा कि हम वेक्सिनेशन की शुरुआत में जरूर कुछ देशों से मदद ले रहे थे। लेकिन कुछ दिनों बाद हम वर्ल्ड लेवल पर वेक्सिनेशन में मदद कर रहे थे। यहीं से पूरी दुनिया में भारत के लिए एक अलग तरह का मैसेज दिया।

हिंदी की दुर्दशा, इसे नहीं मिल रही मां

जेएनयू के रिटायर्ड प्रोफेसर पुष्पेश पंत ने ‘एक हिंदी, अनेक हिंदी’ सेशन में कहा कि आज जिस तरह से हिंदी भाषा की वहीं दुर्दशा हो रही, वह​ चिंता का विषय है। सही मायने में उसे प्राकृतिक मां नहीं मिल पा रही। इसे सेरोगेट मर्दस मिल रही है। मुश्किल से बच्चे टेस्टट्यूब में पैदा हो रहे हैं। इससे मुझे अच्छा लगता नहीं। मैंने अगर 9 महीन की प्रसव वेदना नहीं झेली, तो मैंने अपने बच्चे को हाथ में दूध की शीशी फंसाकर दूध नहीं पिलाया है। तो मैं यह कैसे कह सकता हूं कि उस भाषा से मेरी ममता कम है। मुझे लगता है हिंदी अपने आप ही गढ़ी जाएगी। उसे इंटरनेट सुदृढ़ नहीं कर सकता है।

हिंदी का बढ़ रहा है प्रभाव

वहीं, नंद भारद्वाज ने कहा, लोग ऐसा सोचते हैं कि अंग्रेजी के प्रभाव के चलते हिंदी का महत्व कम हुआ है। मेरा मानना है कि 80 के दशक के बाद जो व्यापारिक प्रवृति बढ़ी है, उसमें हिंदी का प्रभाव बढ़ा है। हिंदी की जो संवाद पावर है, वह बढ़ ही रही है। इसमें तमाम भाषाओं के शब्द प्रवेश कर गए हैं। इससे ताकत बढ़ती जा रही है। यह कमजोर नहीं हुई है, बस चुनौतियां बढ़ी हैं।

अनामिका ने कहा कि हिंदी की स्थिति यह है कि संयुक्त परिवार की सबसे छोटी बेटी थी। खड़ी बोली, उर्दू के साथ तम्बुओं में पैदा हुई। साहित्य के साथ यह आगे बढ़ी। अब यह धीरे-धीरे लोगों का दिल जीत रही है। आज हिंदी में जितने अनुवाद हो रहे हैं, वह पूरी दुनिया की भाषाओं में सबसे ज्यादा है। हिंदी खुली बाहों की भाषा है। खुली बाहों से ही यह लोगों का दिल जीतने में लगी हुई है। तभी हम राष्ट्रभाषा के रूप में इसे पहचान दिला पाएंगे। गीताजंली श्री ने कहा कि हिंदी खुली बाहों की भाषा है। क्या इसे राष्ट्रभाषा बनाने की बात हो रही है? क्या गांधीजी हिन्दुस्तानी भाषा को राष्ट्रभाषा बनाना चाहते थे?

जेएलएफ में ये हस्तियां आ रहीं नजर

इस बार जेएलएफ में सांसद वरुण गांधी, शशि थरूर, गीतकार जावेद अख्तर, लेखक संजीव सान्याल, सौरभ किरपाल, सिद्धार्थ मुखर्जी, साइमन सेबगमोंटेफिओर, सुमित, टोबी वाल्श, अक्षय मुकुल, पी.साइनाथ, लेखिका अलका सरावती, मरयम अस्लानी, अमिया श्रीनिवासन, प्रकाशक आनंदा देवी, पुलित्जर पुरस्कार विजेता कैरलाइन एल्किन्स, डेविड वेनग्रोवा, दयानिता सिंह, दादा साहेब फाल्के पुरस्कार विजेता गोर गोपाल दास, बांसुरी वादक पंडित हरिप्रसाद चौरसिया, जोनाथन फ्रीडलैंड, दुनिया के प्रसिद्ध आर्ट म्यूजियम विजुअल एंड आर्ट के निदेशक त्रिस्तम हंट, उषा उथुप, विद्या कृष्णन हिस्सा ले रहे हैं। जेएलएफ में कई पुरस्कृत इतिहासकार भी शामिल हो रहे हैं। इनमें टाम होलैंड, ऐलेक्स वोन तुंजेलमन, डेविड, एडवर्ड चांसलर और कैटी हैलेस प्रमुख हैं।

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