–राजीव सक्सेना
Editor in Chief
newschakraindia.com

लोकतंत्र में विपक्ष की भूमिका बेहद महत्वपूर्ण होती है। सरकार से सवाल पूछना, उसकी नीतियों की आलोचना करना, जनहित के मुद्दे उठाना और सत्ता को जवाबदेह बनाना—ये सब एक स्वस्थ लोकतंत्र की आवश्यक शर्तें हैं। लेकिन जब राजनीतिक संघर्ष, तर्क और तथ्यों से निकलकर व्यक्तिगत उपहास, भद्दी मिमिक्री, अभद्र भाषा और लगातार उकसावे की राजनीति में बदलने लगे, तो सवाल केवल किसी एक नेता की शैली पर नहीं, बल्कि राजनीतिक संस्कृति पर उठता है।
आज कांग्रेस और राहुल गांधी की राजनीति को लेकर यही सवाल तेजी से सामने आ रहा है। राजनीतिक मुद्दों पर सरकार को घेरने के बजाय कांग्रेस नेतृत्व लगातार ऐसे तौर-तरीकों की ओर बढ़ रहा है, जिनमें गम्भीर विमर्श तो पीछे छूट गया है, मगर सिर्फ तमाशा आगे निकल कर हावी हो गया है। इस प्रवृत्ति को अब ‘राहुटिक्स’ कहा जाना ही बेहतर है—अर्थात ऐसी राजनीति, जिसमें पॉलिटिक्स से ज्यादा नाटकीयता दिखाई दे, गाली गलौच वाली भाषा सुनाई दे।
जब मुद्दे कमजोर पड़ें, तब ही मिमिक्री सहारा बनती है?
राजनीति में व्यंग्य और हास्य कोई नई चीज नहीं है। नेताओं की आलोचना कार्टूनों, भाषणों और व्यंग्य के माध्यम से दशकों से होती रही है। लेकिन लोकतांत्रिक मर्यादा की कसौटी यह है कि हास्य राजनीतिक तर्क का स्थान न ले। राहुल गांधी के नेतृत्व वाली कांग्रेस मगर इस सीमा को सालों पहले लांघ चुकी है। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी और केन्द्रीय गृह मंत्री अमित शाह पर व्यक्तिगत अंदाज में बेहद निम्न और तर्कहीन हमले, संसद परिसर में प्रदर्शन के दौरान आपत्तिजनक प्रतीकों और नारों का इस्तेमाल तथा राजनीतिक विरोध को तमाशे में बदलने की प्रवृत्ति—इन सबने कांग्रेस की रणनीति को पूरी तरह कमजोर साबित करके रख दिया है।
इटली की प्रधानमंत्री जॉर्जिया मेलोनी से मुलाकात के दौरान प्रधानमंत्री मोदी द्वारा शिष्टाचारवश किए गए अभिवादन और आलिंगन की जिस तरह मंचीय मिमिक्री की गई, वह तो अंतरराष्ट्रीय स्तर पर आलोचना का विषय बन गई है। आलोचना का मूल बिंदु यह है कि अंतरराष्ट्रीय कूटनीति के एक सामान्य शिष्टाचार को राजनीतिक उपहास का विषय बनाना क्या वास्तव में राजनीतिक बहस का स्तर ऊंचा करता है? और उससे भी बड़ा सवाल उस माहौल को लेकर है जिसमें ऐसी प्रस्तुति पर ठहाके और तालियां सुनाई देती हैं।
विपक्ष के सामने सबसे बड़ा सवाल
किसी भी लोकतंत्र में सत्ता पक्ष से सवाल पूछना विपक्ष का अधिकार ही नहीं, उसका कर्तव्य है। लेकिन विपक्ष की विश्वसनीयता केवल इस बात से तय नहीं होती कि वह सरकार का कितना विरोध करता है। यह भी देखा जाता है कि विरोध का तरीका कितना जिम्मेदार है।
यही कारण है कि कांग्रेस के साथ खड़े अन्य विपक्षी दलों से भी सवाल पूछा जा सकता है—क्या वे हर परिस्थिति में केवल इसलिए साथ खड़े रहेंगे, क्योंकि लक्ष्य भाजपा या प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी हैं? क्या राजनीतिक गठबंधन का अर्थ यह भी हो गया है कि सहयोगी दल किसी भी शैली और किसी भी भाषा का समर्थन करें? विपक्ष जितना बड़ा होगा, उससे अपेक्षाएं भी उतनी ही बड़ी होंगी।
संसद परिसर भी राजनीतिक नौटंकी का मंच नहीं
संसद लोकतंत्र का सर्वोच्च राजनीतिक मंच है। वहां प्रदर्शन हो सकते हैं, नारे लग सकते हैं, सरकार से जवाब मांगा जा सकता है और तीखी बहस भी हो सकती है। लेकिन जब प्रदर्शन प्रतीकों और ऐसी प्रस्तुतियों तक पहुंच जाएं, जिन्हें आम नागरिक अशोभनीय मानता है, तब सवाल उठना स्वाभाविक है कि क्या राजनीतिक संदेश वास्तव में जनता तक पहुंच रहा है या फिर पूरी कवायद केवल सुर्खियां बटोरने तक सीमित है?
यदि किसी मुद्दे पर सरकार को घेरना है, तो आंकड़े रखिए, दस्तावेज रखिए, पीड़ितों की आवाज संसद में उठाइए, जांच की मांग कीजिए और सरकार को जवाब देने के लिए मजबूर कीजिए। यही लोकतांत्रिक राजनीति की ताकत है। तमाशा कुछ घंटे की सुर्खियां दे सकता है, लेकिन तर्क लम्बे समय तक जनता के मन में रहता है।
NEET से लेकर दूसरे मुद्दों तक—राजनीति बनाम नैरेटिव
NEET पेपर लीक जैसे मुद्दे गम्भीर हैं। विद्यार्थियों के भविष्य से जुड़े प्रश्नों को किसी भी राजनीतिक दल को गम्भीरता से उठाना चाहिए। लेकिन ऐसे मुद्दों पर राजनीति करते समय आरोप और तथ्य के बीच की रेखा नहीं मिटनी चाहिए।
यदि किसी दल को लगता है कि सरकार ने कोई गलती की है, तो उसके पास लोकतांत्रिक संस्थाओं के भीतर उसे साबित करने और सरकार को कठघरे में खड़ा करने के पर्याप्त रास्ते हैं। हर चुनावी लड़ाई को केवल ‘कौन ज्यादा शोर कर सकता है’ की प्रतियोगिता में बदल देना लोकतंत्र के लिए शुभ संकेत नहीं है। ‘कुछ भी करो, बस मोदी सरकार को परेशान करो’—क्या यही रणनीति है? कांग्रेस की वर्तमान राजनीतिक शैली पार्टी विरोध व नीति-विरोध से आगे बढ़कर व्यक्ति-केन्द्रित विरोध बन गई है।
यदि राजनीतिक रणनीति का अंतिम लक्ष्य यह हो कि प्रधानमंत्री और उनकी सरकार इतनी राजनीतिक छींटाकशी में उलझ जाए कि विकास, प्रशासन और नीतिगत कामकाज प्रभावित हों, तो यह रणनीति अंततः जनता के लिए ही नुकसानदेह होगी। सरकार को परेशान करना मात्र ही किसी विपक्ष का लक्ष्य नहीं होना चाहिए। अपितु सरकार को जवाबदेह बनाना उसका लक्ष्य होना चाहिए। इन दोनों बातों के बीच जमीन-आसमान का अंतर है।
राजनीति में गुस्सा हो सकता है, गरिमा क्यों नहीं?
राहुल गांधी और कांग्रेस के समर्थकों के पास सरकार की नीतियों से असहमति का पूरा अधिकार है। वे नरेन्द्र मोदी की नीतियों की तीखी आलोचना कर सकते हैं। अमित शाह के निर्णयों पर सवाल उठा सकते हैं। भाजपा को चुनावी चुनौती दे सकते हैं। यह लोकतंत्र है और यही लोकतंत्र की खूबसूरती है। लेकिन व्यक्तिगत उपहास, भद्दी मिमिक्री और अभद्र राजनीतिक प्रस्तुति को राजनीति का पर्याय बना देना एक अलग बात है। राजनीतिक विरोध की धार तर्क से तेज होनी चाहिए, भाषा की अश्लीलता से नहीं।
जनता आखिर सब देख रही है
राजनीति में हर रणनीति का अंतिम निर्णायक जनता होती है। मंच पर तालियां बजाने वाली भीड़ और चुनाव के दिन मतदान करने वाली जनता—दोनों हमेशा एक जैसी नहीं होती।
जनता बेरोजगारी, महंगाई, शिक्षा, सुरक्षा, बुनियादी ढांचे, भ्रष्टाचार, राष्ट्रीय सुरक्षा और विकास जैसे मुद्दों पर जवाब चाहती है। वह यह भी देखती है कि कौन नेता समस्या का समाधान प्रस्तुत कर रहा है और कौन केवल विरोध के लिए विरोध कर रहा है।
इसलिए यदि कांग्रेस वास्तव में भाजपा को चुनौती देना चाहती है, तो उसे केवल प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी का विरोध करने से आगे जाना होगा। उसे यह बताना होगा कि वह सत्ता में आएगी तो करेगी क्या? केवल यह कहना कि ‘मोदी को हराना है’ अपने आप में कोई शासन-दर्शन नहीं है।
अंततः सवाल राहुल गांधी का नहीं, राजनीति के स्तर का है
राहुल गांधी हों, नरेन्द्र मोदी हों, अमित शाह हों या किसी भी दल के दूसरे नेता—लोकतंत्र में किसी को भी आलोचना से ऊपर नहीं होना चाहिए। लेकिन आलोचना का अधिकार और मर्यादा की जिम्मेदारी साथ-साथ चलती है। अगर राजनीति तर्क से हटकर नकल, नारे, उपहास और व्यक्तिगत कटाक्ष का अखाड़ा बनती चली गई, तो नुकसान किसी एक पार्टी का नहीं होगा, यह नुकसान लोकतांत्रिक संवाद का होगा।
इसलिए ‘राहुटिक्स’ महज एक राजनीतिक व्यंग्य-शब्द नहीं, बल्कि उस प्रवृत्ति पर सवाल है, जिसमें राजनीति का उद्देश्य नीति और राष्ट्रहित से हटकर तमाशा और प्रतिद्वंद्वी को परेशान करना बन जाए। लोकतंत्र में अंततः वही राजनीति टिकती है, जो जनता के सवालों का जवाब देती है और जनता के सवाल उठाती है ना कि व्यक्तिगत खुन्नस और दुश्मनी। चुनाव मंच की तालियों से नहीं, जनता के विश्वास से जीते जाते हैं।
