प्यार की ताकत: साइकिल चलाकर भारत से स्वीडन पहुंचा था प्रेमी, अब जी रहा है खुशनुमा जीवन
एनसीआई@सेन्ट्रल डेस्क
यह सच है कि प्यार अगर सच्चा हो तो इंसान उस तक पहुंचने के लिए या उसे पाने के लिए कुछ भी कर गुजरता है। इसी सिलसिले में एक बेहद हैरतअंगेज वाकया सामने आया है। जो भी इसके बारे में सुनता है, उसे एक बार तो यह कोई फिल्मी कहानी ही लगती है।

दरअसल, करीब 46 साल पहले एक भारतीय अपनी विदेशी पत्नी से मिलने के लिए साइकिल लेकर ही सात समंदर पार उसके देश जा पहुंचा। ओडिशा के रहने वाले प्रद्युम्न कुमार महानंदिया ने दिल्ली से स्वीडन तक का सफर साइकिल पर तय कर यह कारनामा किया था। इसमें उन्हें चार महीने लगे थे।
पेंटिंग बनाते बनाते प्यार में पड़े प्रद्युम्न

ओडिशा के रहने वाले आदिवासी समाज के डॉ. प्रद्युम्न कुमार महानंदिया शानदार स्केच कलाकार थे। स्वीडन की शेर्लोट वर्ष 1975 में भारत घूमने आईं। प्रद्युम्न कुमार महानंदिया की कला देश-विदेश में मशहूर थी। वो सामने बैठे व्यक्ति को हबहू पेपर पर उतार देते थे, अर्थात उसका ठीक वैसा ही चित्रांकन कर देते थे। वह उन दिनों दिल्ली के कनॉट प्लेस पर यह काम करते थे। शेर्लोट उनके पास यहां पहुंचीं और उनसे अपनी एक पेंटिंग बनवाने की इच्छा जाहिर की। पेंटिंग बनाने के दौरान ही प्रद्युम्न का दिल शेर्लोट की सुंदरता पर आ गया और दोनों में प्यार हो गया। प्यार में पड़ने के बाद जल्द ही दोनों ने आदिवासी रीति-रिवाज से शादी कर ली। शादी के कुछ समय बाद वीजा अवधि खत्म होने के कारण शेर्लोट को अचानक स्वीडन लौटना पड़ा। शेर्लोट ने प्रद्युम्न को भी साथ चलने को कहा, मगर उस समय उनकी पढ़ाई जारी थी, इसलिए वह नहीं जा सके। इस बीच इनका पत्रों के माध्यम से सम्पर्क जारी रहा।

ऐसे शुरू हुआ साइकिल का सफर
कुछ समय बाद प्रद्युम्न ने स्वीडन जाने का निश्चय किया। मगर उनके पास हवाई जहाज के टिकट का पैसा नहीं था, इस कारण ही शुरू हुआ इनका साइकिल का सफर।
जनवरी 1977 में, उन्होंने अपना सारा सामान बेचकर भारत से स्वीडन जाने के लिए एक साइकिल खरीदी। 22 जनवरी 1977 को वे अपने इस सफर पर रवाना हुए। प्रद्युम्न दिल्ली से अमृतसर व फिर पाकिस्तान, अफगानिस्तान, ईरान, तुर्की, बुल्गारिया, जर्मनी और ऑस्ट्रिया को पार कर स्वीडन के बॉर्डर पर जा पहुंचे। इस साइकिल की सवारी में उन्हें 4 महीने और 3 हफ्ते लगे थे। वो हर दिन लगभग 70 किमी (44 मील) साइकिल चलाते थे। अपने सफ़र के दौरान वह लोगों की तस्वीरें बनाते और इस तरह उन्हें कुछ पैसे मिल जाया करते थे। कुछ लोग उन्हें खाना और रहने की जगह भी दे दिया करते थे। महानंदिया ने कहा कि 70 के दशक में दुनिया काफ़ी अलग थी, क्योंकि इस दौरान ज्यादातर देशों में वीज़ा की कोई ज़रूरत नहीं होती थी।

शेर्लोट से मिलने की खुशी में सब तकलीफ भूल गए
बीबीसी को दिए अपने इंटरव्यू में उन्होंने कहा था कि इस सफ़र के दौरान उनके पैरों में हमेशा बहुत दर्द रहता था, लेकिन शेर्लोट से मिलने की खुशी में वह सब भूल जाते थे।
मगर बड़ी समस्या प्रद्युम्न के स्वीडन की सीमा पर पहुंचने के बाद आई। उनके पास इमीग्रेशन वीजा नहीं था, इसलिए उन्हें बॉर्डर पर ही रोक दिया गया। इसके बाद उन्होंने अधिकारियों को शेर्लोट से अपने रिश्ते के बारे में बताया, मगर अधिकारियों को इस पर विश्वास नहीं हो पा रहा था। उन्होंने शेर्लोट से सम्पर्क किया तो प्रद्युम्न की बात सही निकली। इस प्रकार उनका अपनी पत्नी से वापस मिलन हो सका। यहां प्रद्युम्न को शेर्लोट के पिता को प्रभावित करने में भी इस काफी समस्याओं का सामना करना पड़ा। लेकिन आखिर में बात बन गई और यहां इन दोनों की स्विस रीति-रिवाज से भी शादी कराई गई।
तब से लेकर अब तक यह कपल स्वीडन में ही रह रहा है। प्रद्युम्न ने भी स्वीडिश नागरिकता ले ली है। उनके दो बच्चे हैं।

प्रद्युम्न इतना लम्बा सफर साइकिल पर तय करने के बारे में कहते हैं कि “जो मुझे करना चाहिए था, वो मैंने किया। मेरे पास पैसे नहीं थे, लेकिन मुझे उनसे मिलना था। मैंने अपने प्यार के लिए साइकिलिंग की, जबकि साइकिलिंग से कभी प्यार नहीं किया।” वह कहते हैं, मैं आज भी शेर्लोट से उतना ही प्यार करते हूं, जितना 1975 में किया करता था।
