April 20, 2026

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अब कानून सजा नहीं, न्याय देने के लिए होंगे: आईपीसी, सीआरपीसी और एविडेंस एक्ट में होंगे व्यापक बदलाव, विवादित राष्ट्रद्रोह कानून हो जाएगा खत्म

अब कानून सजा नहीं, न्याय देने के लिए होंगे: आईपीसी, सीआरपीसी और एविडेंस एक्ट में होंगे व्यापक बदलाव, विवादित राष्ट्रद्रोह कानून हो जाएगा खत्म

केन्द्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने भारतीय दंड संहिता (आईपीसी), दंड प्रक्रिया संहिता (सीआरपीसी) और भारतीय साक्ष्य अधिनियम (एविडेंस एक्ट) में संशोधन के लिए लोकसभा में तीन विधेयक पेश किए। ये तीनों विधेयक अब संसदीय समिति के पास रिव्यू के लिए भेज दिए गए हैं। अमित शाह ने बताया कि अंग्रेजों के बनाए कानूनों को खत्म किया जा रहा है, अब इनके तहत सजा नहीं बल्कि न्याय देने का काम किया जाएगा।

एनसीआई@नई दिल्ली

केन्द्रीय गृहमंत्री अमित शाह ने लोकसभा में ऐलान किया कि देश में राजद्रोह कानून को खत्म किया जा रहा है। इसे लेकर सरकार की तरफ से एक प्रस्ताव पेश किया गया है। पिछले कई दशकों से चले आ रहे इस कानून को लेकर काफी विवाद भी हुआ था, कई विपक्षी दलों ने इसे खत्म करने की मांग की थी और इसके दुरुपयोग का आरोप लगाया था।

तीन कानूनों को किया गया खत्म

केन्द्रीय गृहमंत्री ने कहा, मैं जो तीन विधेयक एक साथ लेकर आया हूं, वो तीनों विधेयक दंड विधान प्रक्रिया, क्रिमिनल जस्टिस सिस्टम को सुधारने वाले हैं। पहला इंडियन पीनल कोड जो 1860 में बनाया गया, दूसरा है क्रिमिनल प्रोसिजर कोड जो 1898 में बनाया गया और तीसरा है  इंडियन एविडेंस एक्ट जो 1872 में अंग्रेजों की संसद ने पारित किए थे। इन तीनों को आज हम समाप्त कर तीन नए कानून बनाने के लिए आया हूं।

केन्द्रीय गृहमंत्री ने इस दौरान बताया कि अब भारतीय दंड संहिता की जगह भारतीय न्याय संहिता होगी, वहीं सीआरपीसी की जगह भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता होगी। इसी तरह एविडेंस एक्ट का नाम बदलकर अब भारतीय साक्ष्य अधिनियम किया गया है और राजद्रोह का कानून खत्म करने का प्रस्ताव रखा गया है।

कानूनों का मकसद सभी को न्याय देना

गृहमंत्री शाह ने कहा कि ये कानून अंग्रेज शासन को मजबूत करने के लिए बनाए गए थे, जिसका उद्देश्य दंड देने का था, न्याय देने का नहीं था। इन तीनों कानूनों को रिप्लेस कर जो नए कानून बनेंगे, उनकी आत्मा भारत के नागरिकों को संविधान के तहत जितने अधिकार मिले हैं, उनकी सुरक्षा करना… इन कानूनों का उद्देश्य दंड देना नहीं होगा, सभी को न्याय देना होगा। अब भारतीय आत्मा के साथ ये तीन कानून लागू होंगे।

पहले चेप्टर में महिलाओं के खिलाफ अपराध

गृहमंत्री ने बताया कि इन कानूनों को मैं स्टेंडिंग कमेटी को भेजने वाला हूं, इसलिए इन पर ज्यादा नहीं बोलूंगा। उन्होंने कहा, इन कानूनों की प्राथमिकता अलग थी। महिलाओं के साथ दुराचार से बड़ा कोई अपराध नहीं हो सकता है। इसे 302 नम्बर पर जगह दी गई थी। इससे पहले राजद्रोह, खजाने की लूट, शासन के अधिकारी पर हमला था। इसी अप्रोच को हम बदल रहे हैं। इसमें सबसे पहला चेप्टर महिलाओं और बच्चों के साथ अपराध, दूसरा चेप्टर मानव हत्या और मानव शरीर को जो अपराध आते हैं, उसका आएगा। अमित शाह ने आगे बताया-

• चार साल तक इस पर गहन विचार-विमर्श हुआ है। इस पर चर्चा करने के लिए हमने 158 बैठकें की हैं।

• भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता जो सीआरपीसी को रिप्लेस करेगी, उसमें अब 533 धाराएं बचेंगीं, 160 धाराओं को बदल दिया गया है, 9 धाराएं नई जोड़ी गई हैं और 9 धाराओं को निरस्त किया गया है।

• भारतीय न्याय संहिता जो आईपीसी को रिप्लेस करेगी, इसमें पहले 511 धाराएं थीं, इसकी जगह 356 धाराएं होंगी, 175 धाराओं में बदलाव हुआ है, 8 धाराओं में बदलाव हुआ है और 22 धाराएं निरस्त कर दी गई हैं।

• भारतीय साक्ष्य अधिनियम जो एविडेंस एक्ट को रिप्लेस करेगा, उसमें 170 धाराएं होंगी, पहले 167 थीं, 23 धाराओं में बदलाव किया है, एक धारा नई जोड़ी गई है और पांच धाराएं निरस्त की हैं।

यह है राजद्रोह कानून

आईपीसी की धारा 124 ए के मुताबिक जब कोई भी व्यक्ति बोले गए या फिर लिखे गए शब्दों या संकेतों या फिर किसी और तरह से समाज में घृणा और उत्तेजित करने की कोशिश करता है या फिर भारत की चुनी हुई सरकार के प्रति असंतोष को भड़काने की कोशिश करता है तो वो राजद्रोह के तहत आरोपी माना जाएगा। इस कानून के तहत गिरफ्तारी के बाद जमानत काफी मुश्किल होती है, क्योंकि ये एक गैर-जमानती अपराध है। इसके तहत तीन साल की सजा से लेकर आजीवन कारावास की सजा का प्रावधान है।

राजद्रोह के दुरुपयोग के आरोप

राजद्रोह कानून हमेशा से विवादों में रहा है, विपक्षी दल सत्ताधारी पार्टी पर इसके दुरुपयोग का आरोप लगाते रहे हैं। केदारनाथ सिंह बनाम बिहार राज्य के मामले में फैसला सुनाते हुए सुप्रीम कोर्ट ने इस कानून की व्याख्या की थी। इसमें कोर्ट ने कहा था कि इसे कानून व्यवस्था की गड़बड़ी या फिर हिंसा के लिए उकसाने तक ही सीमित होना चाहिए।

हालिया मामलों की बात करें तो कांग्रेस नेता शशि थरूर समेत कुछ पत्रकारों के खिलाफ राजद्रोह के तहत मामला दर्ज कर लिया गया था। इसे लेकर खूब बवाल हुआ। इसके अलावा हाथरस जा रहे पत्रकार सिद्दीकी कप्पन, मणिपुर में सोशल मीडिया पोस्ट के बाद पत्रकार किशोर चंद्र वांगखेम के खिलाफ राजद्रोह के मामले भी खूब चर्चा में रहे।

अब यह हो जाएगा

ये कानून भारत में अपराधों के अभियोजन प्रक्रिया की नींव हैं। कौन सा कृत्य अपराध है और उसके लिए क्या सज़ा होनी चाहिए ये भारतीय दंड संहिता के तहत तय होता है।

दंड प्रक्रिया संहिता में गिरफ़्तारी, अन्वेषण और मुकदमा चलाने की विधि लिखी हुई है। भारतीय साक्ष्य अधिनियम बताता है कि केस के तथ्यों को कैसे साबित किया जाएगा, बयान कैसे दर्ज होंगे और सबूत पेश की जिम्मेदारी (बर्डन ऑफ़ प्रूफ़) किस पर होगी।

गृह मंत्री का कहना है कि ये क़ानून उपनिवेशवाद की विरासत हैं और इन्हें आज के हालात के अनुकूल बनाया जाएगा।

बिल पेश करते हुए अमित शाह ने कहा, “1860 से 2023 तक अंग्रेजों के बने हुए क़ानून के आधार पर इस देश की आपराधिक न्याय प्रणाली चलती रही। इसकी जगह भारतीय आत्मा के साथ ये तीन क़ानून स्थापित होंगे और हमारी आपराधिक न्याय प्रणाली के अंदर बहुत बड़ा परिवर्तन आएगा।”

उन्होंने कहा, “तीनों क़ानून ग़ुलामी की निशानियों से भरे हुए हैं। इन्हें पहले ब्रिटिश संसद में पास किया गया और उसके बाद यहां लागू किया गया। इन कानूनों में अब भी 475 औपनिवेशिक रेफ़ेरेंस हैं जैसे कि क्राउन, यूनाइटेड किंगडम, लंडन गैजेट।” उन्होंने बताया कि इन विधेयकों के ज़रिए कैसे बदलाव आएंगे.

इससे यह होंगे बदलाव

• भारतीय न्याय संहिता बिल, 2023′ को पेश करने की वजह क़ानून व्यवस्था को मज़बूत बनाना और कानूनी प्रक्रिया का सरलीकरण बताया गया है।

• इंडियन एविडेंस एक्ट को हटाकर ‘भारतीय साक्ष्य अधिनियम’ लाने वाले बिल में लिखा है कि मौजूदा क़ानून पिछले कुछ दशकों में देश में हुई टेक्नोलॉजी के क्षेत्र में तरक्की से मेल नहीं खाता है, इसलिए इसे बदलने की ज़रूरत है।

• सीआरपीसी को हटाकर ‘भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023’ नामक विधेयक संसद में पेश हुआ है। इसका उद्देश्य न्याय प्रक्रिया में देरी को रोकना बताया गया है।

• कहा गया है कि नये कानून में केस के निपटारे की टाइमलाइन होगी और इसमें फ़ॉरेंसिक साइंस के इस्तेमाल का भी प्रावधान होगा।

• अपने भाषण में अमित शाह ने कहा कि भारत में इस समय कन्विक्शन रेट काफ़ी कम है। फ़ॉरेंसिक साइंस की मदद से सरकार इसे 90 फ़ीसदी तक ले जाना चाहती है।

• इन तीनों विधेयकों में मौजूदा तीनों क़ानून में कई परिवर्तन करने के प्रावधान हैं। इसके तहत राजद्रोह को अब अपराध नहीं माना जाएगा।

• झूठी पहचान बताकर शादी करने वाले को कठोर सजा का प्रावधान

केन्द्रीय गृह मंत्री ने कहा कि महिलाओं के प्रति अपराध और सामाजिक समस्याओं के निपटान के लिए कानून बनाया गया है। शादी, रोजगार, पदोन्नति के झूठे वादे और गलत पहचान बताकर जो यौन सम्बन्ध बनाते थे, उसे अपराध की श्रेणी में पहली बार नरेन्द्र मोदी सरकार ला रही है। गैंगरेप के सभी मामलों में 20 साल की सजा या आजीवन कारावास की सजा का प्रावधान किया गया है, जो आज नहीं है। 18 साल से कम आयु की बच्चियों के मामले में मृत्युदंड का भी प्रावधान है।

• भगोड़ों को अब मिलेगी सजा। शाह ने कहा कि ट्रायल में गायब रहने वाले अपराधियों को लेकर भी सजा का प्रावधान किया गया है। उन्होंने कहा कि कई सारे केसों मे दाऊद वांछित है, वो भाग गया, उसका ट्रायल नहीं होता है। हमने तय किया सेशन कोर्ट के जज पूरी प्रक्रिया के बाद जिसको भगोड़ा घोषित करेंगे, उसकी अनुपस्थिति में ट्रायल होगा और उसे सजा भी दी जाएगी। दुनिया में वो कहीं भी छिपे, उसे सजा सुनाई जाएगी। अगर उसे सजा से बचना है तो वह न्याय की शरण में आए। इससे बहुत बड़ा फर्क पड़ने वाला है।

• मॉब लिंचिंग पर भी सजा वाला कानून। अमित शाह ने बिल पेश करते हुए कहा कि मॉब लिंचिंग का बड़ा शोर मचा है, हमने उसको बड़ा केयरफुली देखा है। मॉब लिंचिंग के लिए भी 7 साल की सजा या आजीवन कारावास और मृत्युदंड का प्रावधान इस कानून में किया गया है।

• स्नेचरों पर चलेगा कानून का डंडा। शाह ने कहा कि स्नेचिंग के लिए चाहे महिलाओं की चेन हो या कुछ और कोई प्रावधान नहीं था। बहुत सारे लोग छिप जाते थे, क्योंकि वो चोरी नहीं थी। स्नेचिंग पर प्रावधान नहीं था। अब स्नेचिंग का भी प्रावधान ले आया गया है। 324 में गम्भीर चोट के कारण निष्क्रियता की स्थिति हो जाती थी तो महज 7 साल की सजा थी। किसी को थोड़ा लग जाए और वह एक सप्ताह में अस्पताल से बाहर आ जाए तो उसकी सजा को थोड़ा अलग किया गया है। अगर हमेशा के लिए अपंगता आती है तो इसकी सजा 10 साल या आजीवन कारावास।

• अब एसपी ही बताएंगे कोर्ट को सबकुछ। शाह ने कहा कि डीजीपी को समय नहीं हो या फिर कोई डीजीपी साहब रिटायर हो गया। तो अब उसको बुलाने की जरूरत नहीं है। अब नए कानून के तहत उस समय के एसपी फाइल देखकर कोर्ट को बताएंगे। घोषित अपराधियों की सम्पत्ति की कुर्की का भी हम प्रावधान जोड़ रहे हैं। संगठित अपराध के लिए एक नया प्रावधान जोड़ रहे हैं, जो अंतरराज्यीय गैंग और संगठित अपराध के विरूद्ध एक कठोर सजा का प्रावधान है।

• सजा माफी पर भी अब शर्तें। शाह ने कहा कि अपराधियों जो देश छोड़कर भाग जाते थे, उसके विरुद्ध 10 साल की सजा का प्रावधान लाया गया है। सजा माफी को राजनीतिक यूज करने वाले बहुत किस्से आते थे, अब हमने कह दिया है कि अगर किसी को सजा माफ करनी है तो मृत्यु की सजा को आजीवन कारावास और आजीवन कारावास की सजा को 7 साल तक ही माफ कर सकते हैं। 7 साल के कारावास को 3 साल ही माफ कर सकते हैं। अभी बिहार में कुछ मामले सामने आए हैं, किसी प्रकार से राजनीतिक रसूख वाले लोगों को छोड़ा नहीं जाएगा उनको भी सजा भुगतनी पड़ेगी।

ये अहम है कि तीनों विधेयक संसद की स्टेंडिंग कमेटी के पास भेजे गए हैं।

मई 2020 में केन्द्रीय गृह मंत्रालय ने इन तीन कानूनों में परिवर्तन सुझाने के लिए एक कमेटी का गठन किया था।‌ इसके बाद कई रिटायर जजों, वरिष्ठ वकीलों और रिटायर ब्यूरोक्रेट्स ने कमेटी को अपने विचार भेजे थे। उनका कहना था कि कमेटी में विविधता का अभाव है और इसे पारदर्शी तरीके से काम करना चाहिए।

अब बिल संसदीय समिति के सामने है, जहां विपक्ष इन पर अपनी राय रखेगा।‌ इन बिलों को लॉ कमिशन के पास भी भेजा जाएगा। इसके बाद ही इसे संसद में दोबारा लाया जाएगा, जहां इन पर बहस होगी और फिर इन्हें पारित किया जा सकेगा।

एक बार अंतिम प्रारूप सामने आए तभी पता चलेगा कि इन परिवर्तनों का मौजूद मुकदमों पर क्या असर पड़ेगा।

संविधान के अनुच्छेद 20 के अनुसार किसी व्यक्ति को केवल उस चीज़ के लिए दोषी ठहराया जा सकता है जो घटना के समय अपराध थी। इसलिए जो भी बदलेगा वो भविष्य में होने वाले अपराधों के लिए ही बदलेगा।

कानूनी प्रक्रियाओं में तेजी लाने के सम्बन्ध में, अमित शाह ने कहा कि उनका लक्ष्य अधिकांश मुकदमों को तीन साल के भीतर खत्म करने का है, ताकि बैकलॉग कम हो सके।

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