राजनीति में धार्मिक प्रतीकों का इस्तेमाल, हिंदू धर्म और हिन्दुत्व के बीच बहस तथा कांग्रेस की वैचारिक रणनीति-क्या पार्टी अपने बयानों से खुद ही मुश्किलें बढ़ा रही है?
–राजीव सक्सेना
एक पुरानी कहावत है कि किसी व्यक्ति को नुकसान पहुंचाने के लिए हमेशा उसके विरोधियों की जरूरत नहीं होती, कई बार उसके अपने बयान ही उसके लिए मुश्किलें खड़ी कर देते हैं। राजनीतिक दलों के मामले में भी यह बात लागू होती है। चुनावी राजनीति में एक बयान तत्काल सुर्खियां तो बटोर सकता है, लेकिन उसके दूरगामी परिणाम पार्टी की छवि, जनसमर्थन और विरोधियों के राजनीतिक प्रचार पर भी भारी पड़ सकते हैं।
कांग्रेस और भारतीय जनता पार्टी के बीच धार्मिक प्रतीकों तथा हिन्दुत्व को लेकर चल रही राजनीतिक बहस इसी संदर्भ में देखी जा सकती है। हाल के वर्षों में कांग्रेस के कई वरिष्ठ नेताओं ने धर्म, हिन्दू पहचान, हिन्दुत्व और भाजपा की धार्मिक राजनीति विचारधारा या दृष्टिकोण पर टिप्पणियां की हैं। इनमें से कुछ बयानों को भाजपा ने कांग्रेस के खिलाफ राजनीतिक मुद्दा बनाया है। इसी बहस में तेलंगाना के मुख्यमंत्री ए. रेवंत रेड्डी का ताजा बयान भी जुड़ गया है।
रेवंत रेड्डी का बयान और राम-शिव की राजनीतिक तुलना
कल सोमवार, 28 सितम्बर 2026 को दिल्ली में एक मीडिया कार्यक्रम के दौरान रेवंत रेड्डी ने भगवान शिव और भगवान राम को लेकर ऐसी तुलना की, जिस पर राजनीतिक विवाद खड़ा हो गया। उन्होंने कहा -“भगवान शिव गरीबों के देवता हैं और भगवान राम अमीरों के भगवान हैं। भाजपा ने भगवान राम को ‘चुरा’ (हथिया) लिया है।” यहां उन्होंने उत्तर और दक्षिण की संस्कृति को बांटते हुए कहा कि, हम द्रविड़ हैं और दक्षिण भारत में भगवान शिव की पूजा अधिक होती है, जबकि उत्तर भारत के लोग भगवान राम को ज्यादा मानते हैं। उनका यह भी कहना था कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी या भाजपा के अन्य नेता मंच से कभी ‘हर-हर महादेव’ क्यों नहीं बोलते, वे केवल ‘जय श्री राम’ का नारा ही इस्तेमाल करते हैं।
रेवंत रेड्डी की टिप्पणी का राजनीतिक संदर्भ समझना जरूरी है। वह भाजपा पर भगवान राम के नाम का चुनावी लाभ उठाने का आरोप लगा रहे थे। लेकिन इस आरोप को व्यक्त करने के लिए भगवान राम और भगवान शिव की उपासना को अमीर और गरीब के खांचों में बांटना अपने आप में एक विवादास्पद तरीका है।
भगवान राम और भगवान शिव करोड़ों श्रद्धालुओं की आस्था के केन्द्र हैं। उनकी पूजा किसी एक आर्थिक वर्ग या एक भौगोलिक क्षेत्र तक सीमित नहीं है। उत्तर भारत में शिवभक्ति की व्यापक परम्परा है और दक्षिण भारत में रामभक्ति के भी अनेक ऐतिहासिक तथा धार्मिक केन्द्र हैं। इसलिए दोनों देवताओं को अलग-अलग आर्थिक वर्गों या क्षेत्रीय पहचानों का प्रतिनिधि बताना भारत की विविध धार्मिक परम्पराओं का अपमान है। इस पर यहां यह भी उल्लेखनीय है कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी कई मौकों पर शिव भक्ति में डूबे नजर आए हैं। कई मौकों पर, सभाओं में ‘हर हर महादेव’ का जयघोष करते नजर आए हैं।
भाजपा का पलटवार और कांग्रेस के सामने चुनौती
रेवंत रेड्डी की टिप्पणी पर भाजपा नेताओं ने कड़ी प्रतिक्रिया दी। केंद्रीय मंत्री और भाजपा नेता बंडी संजय कुमार ने आरोप लगाया कि कांग्रेस राजनीतिक लाभ के लिए भगवान राम और भगवान शिव के बीच तथा उत्तर और दक्षिण भारत के बीच विभाजन पैदा करने की कोशिश कर रही है। यहां खास बात यह है कि बंडी संजय कुमार भी तेलंगाना से हैं।
ऐसे में अब कांग्रेस के सामने यह स्पष्ट करने की चुनौती है कि मुख्यमंत्री की टिप्पणी का आशय क्या था ? और क्या वह इसे पार्टी की आधिकारिक वैचारिक स्थिति मानती है?
राहुल गांधी और हिन्दू धर्म बनाम हिन्दुत्व की बहस
कांग्रेस नेता राहुल गांधी के बयान भी लम्बे समय से इसी बहस के केन्द्र में रहे हैं। नवम्बर 2021 में वर्धा में कांग्रेस के एक प्रशिक्षण कार्यक्रम को सम्बोधित करते हुए राहुल गांधी ने हिन्दू धर्म और हिन्दुत्व के बीच अंतर बताया। उनका यह बयान भी राजनीतिक बहस का विषय रहा है।
इसके बाद 12 दिसंबर 2021 को जयपुर में कांग्रेस की रैली में राहुल गांधी ने कहा, ‘मैं हिन्दू हूं, लेकिन हिन्दुत्ववादी नहीं हूं।’ उन्होंने हिन्दू और हिन्दुत्ववादी के बीच अंतर को सत्य की खोज और सत्ता की खोज के रूप में प्रस्तुत किया। उनकी इस अजीब और अप्रत्याशित व्याख्या पर कांग्रेसी भी हक्के-बक्के रह गए थे। भाजपा के पलटवार का बचाव नहीं कर पा रहे थे। इनसे अलग उन्होंने तो यहां तक कह दिया था कि मंदिर में लड़कियां छेड़ने जाते हैं।
सलमान खुर्शीद की पुस्तक: कांग्रेस के भीतर भी उठे सवाल
नवम्बर 2021 में कांग्रेस के वरिष्ठ नेता और पूर्व केन्द्रीय मंत्री सलमान खुर्शीद की पुस्तक Sunrise Over Ayodhya: Nationhood in Our Times को लेकर विवाद खड़ा हुआ था। इस पुस्तक में राजनीतिक हिन्दुत्व की तुलना इस्लामिक स्टेट और बोको हराम जैसे खूंखार आतंकी संगठनों की विचारधारा से की गई थी। भाजपा के अलावा कांग्रेस के वरिष्ठ नेता रहे गुलाम नबी आजाद ने भी इसे गलत और अतिशयोक्तिपूर्ण बताया था। कांग्रेस के भीतर से भी इस तुलना पर आपत्ति सामने आई थी।
मल्लिकार्जुन खरगे का प्रधानमंत्री मोदी पर बयान
29 जनवरी 2024 को प्रकाशित रिपोर्टों के अनुसार, कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे ने देहरादून में एक सभा के दौरान प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी पर निशाना साधते हुए कहा कि वह लोगों का ध्यान भगवान और धार्मिक गुरुओं के बजाय अपने चेहरे पर केन्द्रित करना चाहते हैं। उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि प्रधानमंत्री स्वयं को भगवान विष्णु का 11वां अवतार बनाने की कोशिश कर रहे हैं। साथ ही, उन्होंने धर्म और शासन को अलग रखने की बात कही।
खरगे की टिप्पणी का राजनीतिक उद्देश्य प्रधानमंत्री पर धार्मिक प्रतीकों के इस्तेमाल को लेकर सवाल उठाना था। लेकिन भगवान विष्णु के अवतार से प्रधानमंत्री की तुलना करना भी धार्मिक संदर्भ के कारण विवाद का विषय बन गया।
क्या कांग्रेस की धार्मिक राजनीति में वैचारिक असमंजस है?
इन घटनाओं को एक साथ देखने पर कांग्रेस की राजनीतिक रणनीति को लेकर कई महत्वपूर्ण प्रश्न सामने आते हैं। इनमें सबसे महत्वपूर्ण सवाल यही है कि कांग्रेस अपने कोर वोटर माने जाने वाले मुस्लिम वर्ग को खुश रखने के लिए क्या हिन्दू वोटर्स की चिंता नहीं करती है? या कांग्रेस का मानना है कि उसकी कुछ भी विचारधारा हो, हिन्दुओं का एक हिस्सा हर हालत में उसके ही साथ रहेगा?
