एनसीआई@नई दिल्ली
दिल्ली के पूर्व मुख्यमंत्री और आम आदमी पार्टी (आप) के मुखिया अरविंद केजरीवाल को गुजरात हाईकोर्ट से एक बार फिर झटका लगा है। गुजरात हाईकोर्ट ने पीएम मोदी की डिग्री मांगने से जुड़े विवाद में अरविंद केजरीवाल की उस याचिका को खारिज कर दिया है, जिसमें उन्होंने 25 हजार रुपए का जुर्माना लगाते हुए सुनाए गए आदेश को चुनौती दी गई थी। अदालत ने कहा कि शासन व्यवस्था में बैठा एक राजनेता अपने राजनीतिक उद्देश्यों के लिए वैधानिक प्रक्रिया का इस्तेमाल नहीं कर सकता है।
लाइव लॉ की रिपोर्ट के मुताबिक, हाईकोर्ट ने कहा कि जिस तरह केजरीवाल ने उनके खिलाफ केन्द्रीय सूचना आयोग (सीआईसी) की प्रक्रिया का जवाब दिया और लिखित जवाब देकर मामले को आगे बढ़ाया, वह खुद सबकुछ कहता है और अदालत को इस पर आगे टिप्पणी करने की आवश्यकता नहीं है। चीफ जस्टिस सुनीता अग्रवाल और जस्टिस डीएन रे की बेंच ने कहा कि सीईसी की ओर से केजरीवाल को एक आवेदक मानते हुए स्वत: संज्ञान लेकर आदेश पारित करना कानून के दायरे से बाहर था। अदालत ने सिंगल बेंच के आदेश को बरकरार रखा। हाईकोर्ट ने कहा कि केन्द्रीय सूचना आयोग (सीआईसी) के 2016 के निर्देश को रद्द करने और केजरीवाल पर 25 हजार रुपए का जुर्माना लगाने वाले फैसले में हस्तक्षेप करने का कोई आधार नहीं है।
फटकार के साथ अदालत ने लगाया था जुर्माना
हाईकोर्ट ने कहा, ‘इस मामले के सभी तथ्यों और परिस्थितियों को देखते हुए यह कहा जा सकता है कि अपीलकर्ता ने सुनवाई के दौरान जो भी दलीलें दीं, उनमें से किसी से भी यह साबित नहीं होता कि पहले के फैसले में कोई त्रुटि थी। इसलिए अपील खारिज की जाती है और इस पर कोई अतिरिक्त खर्च नहीं लगाया जाएगा।’ सिंगल बेंच ने 31 मार्च, 2023 को सीआईसी के आदेश को रद्द करते हुए केजरीवाल पर 25 हजार रुपए जुर्माना भी लगाया था। बेंच ने आरटीआई अधिनियम के प्रावधानों के दुरुपयोग को लेकर उन्हें फटकार लगाई थी और कहा था कि उनका रवैया गम्भीर नहीं था।
क्या कहा था अरविंद केजरीवाल ने?
अपील पर सुनवाई के दौरान केजरीवाल के वकील अभिषेक मनु सिंघवी ने जुर्माना लगाए जाने के आधार को चुनौती दी थी। उन्होंने कहा था कि उनके मुवक्किल ने प्रधानमंत्री मोदी की डिग्री मांगने पर ‘लगातार जोर नहीं दिया’ था, जबकि एकल पीठ ने अपने आदेश में इसके विपरीत टिप्पणी की थी। उन्होंने यह भी कहा था कि सीआईसी ने स्वतः संज्ञान लेते हुए कार्यवाही शुरू की थी और एक औपचारिक आवेदन के बजाय एक पत्र के आधार पर केजरीवाल को पक्षकार बनाया था।
यह था पूरा मामला
छह साल पहले, अरविंद केजरीवाल ने एक RTI आवेदन के माध्यम से गुजरात विश्वविद्यालय से मोदी की डिग्री के बारे में जानकारी मांगी थी। गुजरात विश्वविद्यालय ने मोदी की डिग्री अरविंद केजरीवाल को उपलब्ध कराई और उसे अपनी वेबसाइट पर भी प्रकाशित कर दिया। इसके बाद, अरविंद केजरीवाल ने गुजरात उच्च न्यायालय का रुख किया। उन्होंने विश्वविद्यालय की वेबसाइट पर प्रदर्शित डिग्री पर संदेह व्यक्त किया और इसकी जांच की मांग की। गुजरात विश्वविद्यालय ने सभी सम्बंधित दस्तावेज उच्च न्यायालय में प्रस्तुत किए। न्यायालय ने टिप्पणी की कि संदेह का कोई कारण नहीं है और वह डिग्री असली है।
इसके बाद अरविंद केजरीवाल ने सर्वोच्च न्यायालय का रुख किया। लम्बी सुनवाई के बाद, सर्वोच्च न्यायालय ने गुजरात उच्च न्यायालय के फैसले को बरकरार रखा। न्यायालय ने कहा कि चूंकि डिग्री विश्वविद्यालय की वेबसाइट पर उपलब्ध है और सभी दस्तावेज अदालत में पेश किए जा चुके हैं, इसलिए इसमें संदेह की कोई गुंजाइश नहीं है।
मगर केजरीवाल फिर भी नहीं माने
मगर अरविंद केजरीवाल तब भी संतुष्ट नहीं हुए और एक बार फिर गुजरात उच्च न्यायालय जा पहुंचे। जिसके परिणामस्वरूप अदालत ने उन पर अदालत का कीमती समय बर्बाद करने के लिए 25,000 रुपए जुर्माना लगाया। उच्च न्यायालय और सर्वोच्च न्यायालय दोनों ही न्यायालयों ने जिस मामले पर पहले ही आदेश दे दिया था, उस पर बार-बार याचिका दायर करना न्यायिक समय की बर्बादी थी, इसलिए यह जुर्माना लगाया गया।
इसके बाद अरविंद केजरीवाल ने एकल न्यायाधीश (Single Judge) द्वारा लगाए गए जुर्माने को रद्द करने के लिए खंडपीठ (division bench) के समक्ष याचिका दायर की। हालांकि, खंडपीठ ने भी 25 हजार रुपए का जुर्माना बरकरार रखा। यहां खंडपीठ ने यह टिप्पणी भी की कि चूंकि यह मामला पहले ही स्पष्ट हो चुका है, इसलिए बार-बार याचिका दायर करना अनुचित है और इससे अदालत का समय बर्बाद होता है। इसी के साथ अरविंद केजरीवाल को गुजरात उच्च न्यायालय में 25 हजार रुपए का जुर्माना जमा करने का आदेश दिया।
