केन्द्र सरकार ने जारी की ऐसी नई गाइड लाइन, जिस पर बुरी तरह बवाल मचना तय
जन गण मन से पहले बजेगा वन्दे मातरम्, 3 मिनट 10 सेकेंड के राष्ट्रगीत के दौरान खड़ा होना जरूरी, मतलब यही कि-‘भारत में अगर रहना होगा वन्दे मातरम् कहना होगा’, यह नियम कांग्रेस, समाजवादी पार्टी, आरजेडी, टीएमसी, डीएमके जैसी राजनीतिक पार्टियों के अलावा एआईएमआईएम जैसी मुस्लिम विचारधारा पर बनी पार्टियों को बुरी तरह असहज कर देगा
एनसीआई@नई दिल्ली
केन्द्र सरकार ने राष्ट्रगीत ‘वंदे मातरम’ को लेकर नए दिशा-निर्देश जारी किए हैं। गृह मंत्रालय के इस आदेश के अनुसार, अब सरकारी कार्यक्रमों, सरकारी स्कूलों के आयोजनों या अन्य औपचारिक आयोजनों में ‘वन्दे मातरम्’ बजाया जाएगा। इस दौरान इसके सम्मान में हर व्यक्ति का खड़ा होना अनिवार्य होगा। उल्लेखनीय है कि इस साल 26 जनवरी को 77 वें गणतंत्र दिवस पर मुख्य परेड की थीम ‘वन्दे मातरम्’ ही रखी गई थी। परेड में वन्दे मातरम् की झांकी भी शामिल थी।
यहां यह भी व्यवस्था दी गई है कि, अगर राष्ट्रगीत और राष्ट्रगान को एक साथ गाया या बजाया जाता है, तो वन्दे मातरम् पहले बजेगा, और इस दौरान गाने या सुनने वालों को सावधान मुद्रा में खड़ा रहना होगा, ताकि सम्मान और राष्ट्रीय भावना का स्पष्ट संदेश मिले।
नए नियमों के अनुसार, अब वन्दे मातरम् का छह अंतरों वाला 3 मिनट और 10 सेकंड का पूरा संस्करण बजाया जाएगा। इसमें दुर्गा सहित तीन हिन्दू देवियों का उल्लेख है। अब तक वन्दे मातरम् के मूल गीत के छह अंतरों में से केवल पहले दो अंतरे ही गाए जाते थे।
तिरंगा फहराने, कार्यक्रमों में राष्ट्रपति के आगमन, राष्ट्र के नाम उनके भाषणों और सम्बोधनों से पहले और बाद में और राज्यपालों के आगमन और भाषणों से पहले और बाद में सहित कई आधिकारिक अवसरों पर वन्दे मातरम् बजाना अनिवार्य किया गया है।
सिनेमा हॉल में लागू नहीं होंगे नए नियम
मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, केन्द्र ने 28 जनवरी को यह गाइड लाइन जारी की थी। 10 पेजों के आदेश में, सरकार ने यह भी कहा कि सिविलियन पुरस्कार समारोहों, जैसे कि पद्म पुरस्कार समारोह या ऐसे किसी भी कार्यक्रम में जहां राष्ट्रपति उपस्थित हों, वहां भी वन्दे मातरम् बजाया जाएगा। हालांकि, सिनेमा हॉल को नए नियमों से दूर रखा गया है, यानी सिनेमाघरों में फिल्म शुरू होने से पहले ‘वन्दे मातरम्’ बजाना और खड़ा रहना अनिवार्य नहीं होगा। अधिकारियों के मुताबिक नए निर्देश ‘वन्दे मातरम्’ के सम्मान की स्पष्ट दिशा प्रदान करने के लिए बनाए गए हैं।
बंकिम चंद्र ने 1875 में लिखा था, आनंद मठ में छपा था
भारत के राष्ट्रगीत वन्दे मातरम् को बंकिम चंद्र चटर्जी ने 7 नवम्बर 1875 को अक्षय नवमी के पावन अवसर पर लिखा था। यह 1882 में पहली बार उनकी पत्रिका बंगदर्शन में उनके उपन्यास आनंद मठ के हिस्से के रूप में छपा था। 1896 में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के अधिवेशन में रवींद्रनाथ टैगोर ने मंच पर वन्दे मातरम् गाया था। यह पहला मौका था जब यह गीत सार्वजनिक रूप से राष्ट्रीय स्तर पर गाया गया। इस दौरान सभा में मौजूद हजारों लोगों की आंखें नम हो गईं थीं।
शीतकालीन सत्र के दौरान हुआ था विवाद
केन्द्र सरकार ने पिछले साल वन्दे मातरम् के 150 साल पूरे होने पर संसद के शीतकालीन सत्र के दौरान विशेष चर्चा का आयोजन किया था। लोकसभा और राज्यसभा में इस मुद्दे पर जमकर हंगामा हुआ। कांग्रेस ने आरोप लगाया कि सरकार पश्चिम बंगाल में होने वाले आगामी चुनावों को लेकर राष्ट्रगीत को मुद्दा बना रही है।
वहीं, भाजपा ने कांग्रेस पर तुष्टिकरण की राजनीति के तहत वन्दे मातरम् के हिस्से काटने का आरोप लगाया था। भाजपा ने 1937 में देश के पहले प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू की एक चिट्ठी शेयर की थी, जो उन्होंने सुभाष चंद्र बोस को लिखी थी। इस चिट्ठी में नेहरू ने संकेत दिया था कि वन्दे मातरम् की कुछ लाइनें मुसलमानों को असहज कर सकती हैं। संसद में बहस के दौरान भाजपा के पूर्व अध्यक्ष जेपी नड्डा ने कहा था कि राष्ट्रगीत को भी राष्ट्रीय गान और राष्ट्रीय ध्वज के समान दर्जा दिया जाना चाहिए।
‘कांग्रेस ने वंदे मातरम् के टुकड़े किए‘
8 दिसम्बर 2025 को प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने लोकसभा में वन्दे मातरम् पर एक घंटे का उद्बोधन दिया था। उन्होंने इस दौरान कहा था कि कांग्रेस ने मुस्लिम लीग के आगे घुटने टेक दिए और वन्दे मातरम् के टुकड़े कर दिए। नेहरू को लगता था कि इससे मुसलमानों को चोट पहुंच सकती है।
मोदी ने सवाल उठाए थे-वन्दे मातरम् के साथ विश्वासघात क्यों हुआ? वो कौन सी ताकत थी, जिसकी इच्छा पूज्य बापू की भावनाओं पर भी भारी पड़ी? प्रधानमंत्री मोदी ने एक घंटे के इस सम्बोधन में 121 बार वन्दे मातरम् कहा था।
वन्दे मातरम् के चार छंद क्यों हटाए गए थे?
सव्यसाची भट्टाचार्य की किताब ‘वन्दे मातरम्: द बायोग्राफी ऑफ ए सॉन्ग’ के मुताबिक, 20 अक्टूबर 1937 को सुभाष चंद्र बोस को लिखी चिट्ठी में नेहरू ने लिखा था कि वन्दे मातरम् की पृष्ठभूमि और भाषा मुसलमानों को असहज करती है। इसकी भाषा इतनी कठिन है कि बिना डिक्शनरी के समझना मुश्किल है। उस समय वन्दे मातरम् को लेकर देश में साम्प्रदायिक तनाव बढ़ रहा था। जवाहरलाल नेहरू को यह विवाद एक संगठित साजिश का हिस्सा लगता था। इसी मुद्दे पर उन्होंने रवींद्रनाथ टैगोर से सलाह लेने की बात भी लिखी थी।
22 अक्टूबर 1937 को कांग्रेस वर्किंग कमेटी ने मूल गीत के छह अंतरों में से चार अंतरे हटाने का फैसला लिया था। इस बैठक में महात्मा गांधी, जवाहरलाल नेहरू, सरदार पटेल, सुभाष चंद्र बोस, राजेन्द्र प्रसाद, मौलाना अबुल कलाम आजाद, सरोजनी नायडू सहित कई वरिष्ठ नेता शामिल थे।
